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मनुष्य मूलतः आत्मा है और आत्मा नित्य है, उसकी मृत्यु नहीं होती- रासेश्वरी देवी
दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला में अज्ञानता से मुक्ति और कर्म की स्वतंत्रता पर बताए गूढ़ रहस्य

जांजगीर-चांपा। हाई स्कूल ग्राउंड, जांजगीर में आयोजित ‘उपनिषद ज्ञानामृत’ दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला में जगद्गुरु कृपालु महाराज की प्रमुख प्रचारिका रासेश्वरी देवी ने अज्ञानता, कर्म की स्वतंत्रता, माया और भगवत कृपा के संबंध में श्रोताओं को गहन आध्यात्मिक संदेश दिया।
रासेश्वरी देवी ने कहा कि मनुष्य मूलतः आत्मा है और आत्मा नित्य है, उसकी मृत्यु नहीं होती। अज्ञानता के कारण ही मनुष्य स्वयं को शरीर मानकर मृत्यु से भयभीत होता है। उन्होंने कहा कि भगवान सदैव हमारे हृदय में विद्यमान हैं, लेकिन अज्ञानता के कारण मनुष्य उनसे स्वयं को दूर अनुभव करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान को केवल सीमित बुद्धि या शास्त्रों के प्रवचन सुनने मात्र से नहीं जाना जा सकता। प्रवचन मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, लेकिन जब तक बताए गए सिद्धांतों को व्यवहार में उतारकर साधना नहीं की जाती, तब तक आध्यात्मिक ज्ञान जीवन में प्रभावी नहीं होता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अर्जुन का अज्ञान केवल श्रीमद्भगवद्गीता सुनने से दूर नहीं हुआ, बल्कि श्रीकृष्ण की कृपा से उसका अज्ञान समाप्त हुआ। रासेश्वरी देवी ने कहा कि कुछ लोग अपनी शक्ति के बल पर माया को जीतने का प्रयास करते हैं, जबकि माया भगवान की अत्यंत प्रबल शक्ति है। उस पर विजय भी भगवान की कृपा से ही संभव है। इसी प्रकार किसी सच्चे भगवत्प्राप्त संत का सानिध्य मिलना भी केवल शास्त्रों के ज्ञान से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा से संभव होता है। प्रवचन के दौरान उन्होंने उस धारणा को भी स्पष्ट किया कि “बिना भगवान की इच्छा के पत्ता भी नहीं हिलता, इसलिए जब भगवान चाहेंगे तब भक्ति करेंगे।” उन्होंने कहा कि ऐसी सोच मनुष्य को अपने कर्मों की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती। उन्होंने ‘प्रयोजक कर्ता’ और ‘प्रयोज्य कर्ता’ का अंतर समझाते हुए कहा कि भगवान प्रयोजक कर्ता हैं, अर्थात वे जीव को कार्य करने की शक्ति और चेतना प्रदान करते हैं। वहीं जीव प्रयोज्य कर्ता है, जो उस शक्ति का उपयोग किस प्रकार करेगा, यह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान ने मनुष्य को कानों से सुनने की शक्ति दी है, लेकिन उस शक्ति का उपयोग सत्संग सुनने में करना है या निंदा सुनने में, यह मनुष्य की अपनी इच्छा है। इसी प्रकार शुभ और अशुभ कर्मों के लिए जीव स्वयं जिम्मेदार है। प्रवचन के अंत में रासेश्वरी देवी जी ने श्रोताओं के सामने एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा छोड़ी कि यदि भगवान केवल अपनी कृपा से ही मिलते हैं, तो भगवत कृपा आखिर क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है? उन्होंने संकेत दिया कि इस रहस्य का विस्तार अगले दिन के प्रवचन में किया जाएगा।



