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डिजिटल उपस्थिति के बावजूद मत्स्य विभाग में ‘रामराज’!
सहायक संचालक के ड्यूटी से अक्सर नदारद रहने की शिकायत, सख्त निर्देशों के बावजूद निर्धारित मुख्यालय में नहीं रहने का आरोप

जांजगीर-चांपा। मत्स्य विभाग के कार्यालय में डिजिटल युग की तकनीक और ऑनलाइन व्यवस्था लागू होने के बावजूद विभागीय कामकाज की जमीनी स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सहायक संचालक श्रीमती अल्का स्वर्णकार के संबंध में शिकायत सामने आई है कि वे कार्यालयीन समय में अक्सर ड्यूटी से नदारद रहती हैं और निर्धारित मुख्यालय में नियमित रूप से उपलब्ध नहीं रहतीं।
शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि अधिकारी की अनुपस्थिति के कारण विभागीय कार्यों के साथ-साथ मत्स्य पालन से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन और हितग्राहियों की समस्याओं के निराकरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। सबसे गंभीर शिकायत यह है कि अधिकारी के कार्यालय में उपस्थित नहीं रहने के बावजूद उनकी उपस्थिति दर्ज होने तथा नियमित रूप से वेतन आहरित किए जाने की स्थिति की जांच की जानी चाहिए।
हालांकि, यह आरोप जांच के बाद ही प्रमाणित हो सकता है। इसलिए उपस्थिति पंजी, डिजिटल अटेंडेंस रिकॉर्ड, अवकाश स्वीकृति, भ्रमण डायरी, दौरा कार्यक्रम तथा वेतन आहरण से संबंधित अभिलेखों की जांच से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
मुख्यालय में रहने के निर्देशों की अनदेखी
शासकीय व्यवस्था में पदस्थ अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यालयीन उपस्थिति और मुख्यालय से संबंधित नियमों का उद्देश्य यही है कि आम लोगों को विभागीय सेवाओं के लिए अनावश्यक रूप से भटकना न पड़े। छत्तीसगढ़ शासन ने भी हालिया निर्देशों में स्पष्ट किया है कि सक्षम प्राधिकारी से अवकाश स्वीकृत हुए बिना शासकीय सेवक कार्यालय से अनुपस्थित न रहें, बिना पूर्व स्वीकृति अनुपस्थिति को सेवा नियमों के तहत गंभीरता से देखा जा सकता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि मत्स्य विभाग के जिला स्तरीय कार्यालय में जिम्मेदार अधिकारी नियमित रूप से उपलब्ध नहीं रहतीं तो हितग्राही अपनी समस्याएं लेकर किसके पास जाएं? मछली पालन से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन, योजनाओं की जानकारी, आवेदन प्रक्रिया, अनुदान संबंधी प्रकरण और विभागीय अनुमतियों के लिए आने वाले लोगों को अधिकारी से मिलने में कठिनाई होती है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
विभाग की योजनाएं कागजों में या धरातल पर?
मत्स्य विभाग के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी जिले के मछुआरों और मत्स्य पालकों तक शासन की योजनाओं का वास्तविक लाभ पहुंचाने की है। तालाब निर्माण एवं सुधार, मत्स्य बीज, मत्स्य पालन को बढ़ावा देने वाली गतिविधियां, प्रशिक्षण, उपकरण तथा विभिन्न प्रकार की सहायता और अनुदान आधारित योजनाओं के क्रियान्वयन में विभागीय अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में विभागीय कार्यालय में अधिकारी की नियमित उपलब्धता केवल कार्यालयीन अनुशासन का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध हितग्राहियों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं से भी जुड़ा है। शासन स्तर पर भी अधिकारियों को योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करने और अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने पर जोर दिया जाता रहा है। यदि किसी हितग्राही की फाइल समय पर आगे नहीं बढ़ती, तकनीकी स्वीकृति में देरी होती है, अनुदान संबंधी प्रकरण लंबित रहता है अथवा विभागीय मार्गदर्शन नहीं मिल पाता, तो इसका असर सीधे मत्स्य पालकों की आजीविका पर पड़ सकता है।
डिजिटल अटेंडेंस से सामने आएगा पूरा सच
वर्तमान दौर में कार्यालयीन उपस्थिति को लेकर ‘अधिकारी कार्यालय में थीं या नहीं’ जैसे सवालों का जवाब रिकॉर्ड से आसानी से निकाला जा सकता है। यदि संबंधित कार्यालय में डिजिटल अथवा बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था लागू है तो संबंधित अधिकारी की लॉग-इन और लॉग-आउट टाइमिंग, उपस्थिति रिकॉर्ड तथा अवकाश की जानकारी की जांच की जा सकती है। बता दें कि जिले में आधार-सक्षम बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था लागू करने और अधिकारियों- कर्मचारियों के कार्यालय आने-जाने के समय उपस्थिति दर्ज करने के निर्देश भी दिए गए हैं। ऐसे में शिकायत सही है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए किसी अनुमान की जरूरत नहीं है। केवल संबंधित अवधि का डिजिटल अटेंडेंस रिकॉर्ड सार्वजनिक अथवा सक्षम जांच अधिकारी के समक्ष परीक्षण के लिए प्रस्तुत किया जाए तो स्थिति स्वतः स्पष्ट हो सकती है।
भ्रमण पर थीं तो भ्रमण डायरी बताएगी स्थिति
मत्स्य विभाग के अधिकारी मैदानी निरीक्षण, तालाबों का निरीक्षण, मत्स्य पालन केंद्रों का दौरा, हितग्राहियों से संबंधित कार्य अथवा अन्य विभागीय दायित्वों के लिए कार्यालय से बाहर रह सकते हैं। इसलिए केवल कार्यालय में अधिकारी के नहीं मिलने को अपने आप अनुपस्थिति नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि संबंधित अधिकारी कार्यालयीन समय में मैदानी दौरे पर थीं, तो उस अवधि का पूर्व निर्धारित भ्रमण कार्यक्रम, दौरा डायरी, निरीक्षण प्रतिवेदन, वाहन लॉगबुक और संबंधित अधिकारियों/हितग्राहियों के रिकॉर्ड भी उपलब्ध होना चाहिए। यही दस्तावेज शिकायत और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर स्पष्ट कर सकते हैं।
अव्यवस्था पर उच्चाधिकारी कब लेंगे संज्ञान
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि शासन-प्रशासन की ओर से अधिकारियों को समय पर कार्यालय में उपस्थित रहने, मुख्यालय में रहने तथा जनहित से जुड़े कार्यों में लापरवाही नहीं करने के निर्देश दिए जाते हैं, लेकिन यदि उन्हीं निर्देशों का पालन किसी विभाग में नहीं हो रहा है तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। अब देखने वाली बात यह होगी कि उच्चाधिकारी इस शिकायत को केवल सामान्य शिकायत मानकर छोड़ते हैं या फिर उपस्थिति रजिस्टर, डिजिटल अटेंडेंस, अवकाश रिकॉर्ड, भ्रमण डायरी, वेतन आहरण अभिलेख, लंबित प्रकरण और योजनावार प्रगति रिपोर्ट की निष्पक्ष जांच कराते हैं।



