Reg No. CG-06-0026209
WhatsApp Image 2026-06-28 at 09.42.10
IMG-20250604-WA0015-1
IMG-20250604-WA0014-1
WhatsApp Image 2026-06-25 at 17.56.31 (1)
WhatsApp Image 2026-06-25 at 17.55.51 (1)
छत्तीसगढ़जांजगीर-चाम्पादेश- विदेशराज्य एवं शहररायपुर

शिक्षा का अधिकार और उम्मीदों का संघर्ष: एक जमीनी हकीकत

जांजगीर-चांपा। आज जब मैं घर-घर संपर्क अभियान (डोर-टू-डोर सर्वे) के लिए निकला, तो शिक्षा की एक ऐसी तस्वीर सामने आई जो कहीं खुशी देती है तो कहीं गहरा आत्मचिंतन करने पर मजबूर कर देती है। एक तरफ वो बच्चा है जिसे हमने आज उसके घर जाकर स्कूल में भर्ती कराया—उसकी आंखों में स्कूल जाने की चमक और भविष्य की उम्मीद थी। वहीं दूसरी तरफ, उन बच्चों की रिक्तियां हैं जो अपने माता-पिता के साथ काम की तलाश में कहीं दूर पलायन कर गए हैं। यह उन परिवारों की विवशता है, जहाँ पेट भरने की जद्दोजहद में शिक्षा कहीं पीछे छूट जाती है।
अभाव और संवेदनशीलता: एक गंभीर विसंगति
ग्रामीण परिवेश में जब हम अभिभावकों से मिलते हैं, तो एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो शिक्षा की अहमियत को समझता तो है, लेकिन गरीबी की जकड़न उन्हें असहाय बना देती है। उनकी संवेदनशीलता में कमी नहीं, बल्कि संसाधनों का भारी अभाव है। अक्सर शिक्षक के रूप में हमें लगता है कि पालक जागरूक नहीं हैं, लेकिन वास्तव में वे ‘जीविका’ और ‘ज्ञान’ के बीच के उस खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ उन्हें रोटी चुननी पड़ती है।
शिक्षक की भूमिका यहाँ केवल एक ‘पढ़ाने वाले’ की नहीं रह जाती। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षक एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक परामर्शदाता और एक ऐसे पुल की तरह है जो बच्चे को स्कूल तक खींचकर लाता है। हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारा हर कदम, हर घर का दौरा उन बच्चों के लिए एक नई सुबह बन सकता है।
​प्राइवेट बनाम सरकारी: दो दुनियाओं का फासला
​जब हम गरीब बच्चों की तुलना प्राइवेट स्कूलों के बच्चों से करते हैं, तो यह अंतर केवल संसाधनों का नहीं, बल्कि ‘अवसरों’ का होता है।
समानता का दिखावा: एक तरफ वे बच्चे हैं जो आधुनिक सुविधाओं, डिजिटल टूल्स और निजी ट्यूशन के बीच पल रहे हैं। दूसरी तरफ वे बच्चे हैं जिनके पास बुनियादी संसाधन—जैसे कि किताबें, स्कूल बैग या कभी-कभी तो घर पर पढ़ने का शांत कोना तक नहीं होता।

See also  हरियाणा: पूर्व कांग्रेस विधायक धर्म सिंह छौक्कर गिरफ्तार, 1500 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ED की बड़ी कार्रवाई...
​हृदयविदारक सच: यह तुलना इसलिए भी करुण है क्योंकि प्रतिभा में कोई कमी नहीं होती। गरीब बस्तियों के बच्चों की आँखों में वही जिज्ञासा है जो किसी भी शहर के संपन्न बच्चे की आँखों में होती है। फर्क केवल इतना है कि एक बच्चा ‘विकल्पों’ के साथ बड़ा होता है, जबकि दूसरा ‘संघर्ष’ के साथ।
शिक्षक का संकल्प: हमें सरकारी स्कूल के बच्चों को केवल ‘पढ़ाना’ नहीं है, बल्कि उन्हें उस आत्मविश्वास से भरना है कि वे भी दुनिया के किसी भी कोने में प्रतिस्पर्धा कर सकें। जब हम उन्हें मुख्यधारा में जोड़ते हैं, तो हम केवल एक बच्चे को नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को उस गरीबी के चक्र से बाहर निकाल रहे होते हैं।
​निष्कर्ष
आज का दिन एक सीख दे गया। स्कूल में भर्ती किया गया वह बच्चा कल समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनेगा, और जो बच्चे पलायन कर गए, उनके लिए हमें और अधिक सशक्त प्रयास करने होंगे। शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है, यह उन अभावग्रस्त बच्चों के लिए न्याय की आखिरी उम्मीद है।

See also  नेशनल हाईवे 149 बी में सिवनी व बालपुर मार्ग पर एप्रोच रोड की मांग, जिला पंचायत के सभापति उमा राजेंद्र राठौर ने जनदर्शन में दिया आवेदन...
​एक शिक्षक के रूप में, हमारा कर्तव्य है कि हम न केवल स्कूलों में उपस्थिति बढ़ाएं, बल्कि उन पालकों के विश्वास को भी जीवित रखें, ताकि वे अपने बच्चों को ‘काम करने वाली मशीन’ नहीं, बल्कि ‘देश का भविष्य’ समझें। यह लड़ाई कठिन है, लेकिन जिस दिन उस आखिरी बच्चे के हाथ में किताब होगी, उस दिन हमारी संवेदनशीलता और हमारे प्रयास सार्थक हो जाएंगे।

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!