क्या भारत में प्रिंट मीडिया गायब हो रहा है? देशभर में 88,315 प्रकाशनों का पंजीकरण रद्द,रजिस्ट्रेशन के नियम भी बदले, पढ़िए पूरी खबर

नई दिल्ली। देश में प्रिंट मीडिया की स्थिति को लेकर एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। 11 मार्च 2026 को संसद में केंद्र सरकार ने जानकारी दी कि नए प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से पत्र-पत्रिकाओं पर 5.63 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया गया है और देशभर में कुल 88,315 प्रकाशनों का पंजीकरण रद्द कर दिया गया है।
सरकार के अनुसार 1 मार्च 2024 से लागू नई व्यवस्था के तहत अब तक 1.5 लाख से अधिक पुराने रिकॉर्ड डिजिटाइज किए जा चुके हैं और 11,081 नए आवेदनों का निपटारा भी किया गया है।
157 साल पुराने कानून की जगह नया अधिनियम
प्रेस और पंजीकरण व्यवस्था में बदलाव करते हुए केंद्र सरकार ने प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ पीरियॉडिकल्स (PRP) एक्ट, 2023 लागू किया है, जिसने 1867 के औपनिवेशिक दौर के पुराने कानून की जगह ली है। इस नई व्यवस्था के तहत अखबार और पत्रिकाओं के पंजीकरण, स्वामित्व परिवर्तन, वार्षिक विवरण, प्रसार सत्यापन और जुर्माने का भुगतान अब पूरी तरह ऑनलाइन प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से किया जा रहा है।
सरकार का दावा है कि देश के करीब 780 जिलों को इस डिजिटल व्यवस्था से जोड़ा गया है और पुराने कागजी रिकॉर्ड को स्कैन कर ऑनलाइन उपलब्ध कराया गया है।
हजारों प्रकाशनों के रद्द होने पर उठे सवाल
हालांकि 88 हजार से अधिक प्रकाशनों के रद्द होने के आंकड़े ने मीडिया जगत में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से कुछ प्रकाशन ऐसे भी हो सकते हैं जो सिर्फ कागजों में दर्ज थे और वास्तविक रूप से प्रकाशित नहीं होते थे।
लेकिन दूसरी ओर आशंका यह भी जताई जा रही है कि कई छोटे शहरों और कस्बों से निकलने वाले छोटे अखबार या साप्ताहिक पत्र केवल डिजिटल प्रक्रिया या समयसीमा पूरी न कर पाने के कारण पंजीकरण से वंचित हो गए होंगे।
जवाबदेही बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी। प्रकाशकों को अब हर साल अपना विवरण देना होगा, स्वामित्व स्पष्ट करना होगा और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर रोक लगाने का प्रावधान भी रखा गया है।
मगर आलोचकों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर पंजीकरण रद्द होने से यह सवाल भी उठता है कि क्या सभी मामलों में उचित प्रक्रिया अपनाई गई और प्रभावित प्रकाशनों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला।
डिजिटल व्यवस्था और जमीनी चुनौतियां
विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटलीकरण जहां बड़े शहरों के मीडिया संस्थानों के लिए सुविधा लेकर आया है, वहीं छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में सीमित संसाधनों के कारण कई प्रकाशकों के लिए यह नई प्रक्रिया चुनौती बन सकती है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है और न्यायालय भी समय-समय पर प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का आधार बताते रहे हैं। ऐसे में नई व्यवस्था के प्रभाव को लेकर बहस तेज हो गई है।
व्यवस्था में सुधार या विविधता पर असर?
विश्लेषकों का कहना है कि पहले की व्यवस्था में भी कई खामियां थीं, जैसे एक ही नाम से कई प्रकाशन, फर्जी प्रसार संख्या और जवाबदेही की कमी। नई प्रणाली इन कमियों को दूर करने की कोशिश है।
हालांकि सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था छोटे और स्वतंत्र प्रकाशनों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करेगी या फिर केवल बड़े मीडिया संस्थानों के लिए ही आसान साबित होगी।
आगे की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रेस सेवा पोर्टल को प्रभावी और संतुलित बनाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश, त्वरित अपील प्रक्रिया और छोटे प्रकाशनों के लिए सहयोगी तंत्र की आवश्यकता होगी।
मीडिया जगत का मानना है कि भारत की ताकत उसकी विविध और बहुभाषी मीडिया परंपरा में रही है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि नई व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही तो बढ़ाए, लेकिन साथ ही मीडिया की विविधता और स्वतंत्रता भी सुरक्षित रखे।



