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छत्तीसगढ़ में बड़ा फर्जीवाड़ा : मेडिकल सीट पाने के लिए लगाया फर्जी EWS प्रमाणपत्र, बिलासपुर-कोरबा तक फैला नेटवर्क

रायपुर/बिलासपुर, 12 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए फर्जी EWS (Economically Weaker Section) प्रमाणपत्र बनवाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जांच में पता चला है कि कई छात्राओं ने फर्जी प्रमाणपत्र लगाकर एमबीबीएस सीट हासिल कर ली। यह नेटवर्क बिलासपुर से लेकर कोरबा तक फैला हुआ बताया जा रहा है।

कैसे खुला फर्जीवाड़े का भंडाफोड़

मामले का पर्दाफाश तब हुआ जब चिकित्सा शिक्षा आयुक्त ने कॉलेजों में दाखिला लेने वाले छात्रों के EWS प्रमाणपत्रों की जांच के आदेश दिए। जब प्रमाणपत्र संबंधित तहसीलों में वेरिफिकेशन के लिए भेजे गए, तो चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई — जिन तहसीलों से प्रमाणपत्र जारी होना बताया गया था, वहां इन छात्रों का कोई आवेदन या रिकॉर्ड ही नहीं मिला।

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तीन छात्राओं के नाम सामने –

जांच में अब तक जिन तीन छात्राओं के नाम सामने आए हैं, वे हैं —

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  • सुहानी सिंह (सीपत रोड, लिंगियाडीह)
  • श्रेयांशी गुप्ता (सरकंडा)
  • भाव्या मिश्रा (सरकंडा, पटवारी गली)                     इन छात्राओं ने NEET-UG परीक्षा के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लिया और EWS आरक्षण का लाभ उठाया। परंतु वेरिफिकेशन में यह साबित हुआ कि उन्होंने जो सर्टिफिकेट जमा किए, वे पूरी तरह फर्जी थे।

प्रशासन की जांच में खुली पोल

तहसीलदार गरिमा सिंह ने जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि इन नामों पर कभी कोई आवेदन प्राप्त नहीं हुआ था, न ही तहसील कार्यालय से ऐसा कोई प्रमाणपत्र जारी किया गया था। वहीं एसडीएम मनीष साहू ने कहा कि वेरिफिकेशन के लिए जब सूची आई, तो संबंधित अभिलेखों की जांच में यह पूरा मामला संदिग्ध पाया गया।

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मेडिकल कॉलेजों की सीटों पर पड़ा असर

इन छात्राओं ने फर्जी दस्तावेज लगाकर उन अभ्यर्थियों की सीटें छीन लीं जो वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से थे और सही हकदार थे। विभाग ने अब इन सीटों को लेकर कानूनी कार्रवाई और दाखिला निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

राज्य स्तर पर जांच के आदेश

यह मामला अब रायपुर से लेकर बिलासपुर और कोरबा तक पहुंच गया है। प्रारंभिक जांच के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इसे राज्य स्तरीय जांच समिति को सौंपा है। संबंधित तहसीलदारों, कॉलेज प्रशासन और काउंसलिंग प्रकोष्ठ से भी रिपोर्ट मांगी गई है।

यह फर्जीवाड़ा न केवल नियमों की धज्जियां उड़ाता है बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि एडमिशन प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों की जांच कितनी लापरवाही से की जाती है।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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