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छत्तीसगढ़जांजगीर-चाम्पा

Sawan 2024: सावन में कांवड़िए नंगे पैर क्यों चलते हैं, पढ़िए इसके पीछे की भगवान परशुराम से जुड़ी भगवान…

भगवान परशुराम भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं। मान्यता है कि वे सबसे पहले कांवड़ लेकर बागपत जिले के पास पुरा महादेव गए थे और शिवजी का अभिषेक किया था। उन्होंने अपने पिता के कहने पर ऐसा किया था। तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई और हर साल इसी तरह लोग कांवड़ यात्रा करते हैं।

कांवर यात्रा के दौरान कांवड़िए सैकड़ों किलोमीटर नंगे पैर चलते हैं।

इस यात्रा के दौरान कई नियम होते हैं, जिनका पालन करना चाहिए।

सबसे पहले इस कांवड़ यात्रा की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी।

जांजगीर-चांपा। Sawan 2024: इस साल शिव का प्रिय महीना सावन 22 जुलाई 2024 को शुरू होने वाला है। सावन का महीना शुरू होते ही कांवड़ यात्रा भी शुरू हो जाती है। सावन के महीने में कांवड़िए पवित्र स्थान से गंगा जल लेकर आते हैं और महादेव का जलाभिषेक करते हैं।

कांवर यात्रा के दौरान कांवड़िए सैकड़ों किलोमीटर तक नंगे पैर चलते हैं। यात्रा के दौरान ऐसे कई नियम हैं, जिनका पालन करना जरूरी होती है। आइए, जानते हैं कि कांवड़ यात्रा के दौरान यात्री नंगे पैर क्यों चलते हैं और इस यात्रा की शुरुआत किसने की थी।

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ऐसे शुरू हुई थी कांवड़ यात्रा

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पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा सहस्त्रबाहु ऋषि जमदग्नि के पास गए। ऋषि जमदग्नि ने उनकी सेवा और सम्मान की उत्तम व्यवस्था की। सहस्त्रबाहु भी ऋषि के सम्मान और आतिथ्य से बहुत प्रसन्न हुए, लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि एक साधारण और गरीब ऋषि उनके और उनकी सेना के लिए इतना भोजन कैसे जुटा पाया। वे इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए उत्सुक थे। इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों को अपने प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए काम पर लगा दिया।

सहस्त्रबाहु ने जाहिर की इच्छा
कुछ समय बाद उन्हें उनके प्रश्न का उत्तर मिल गया। सैनिकों ने सहस्त्रबाहु को जानकारी दी कि ऋषि जमदग्नि के पास कामधेनु नामक एक दिव्य गाय है, वह इस गाय से जो भी मांगते हैं, उन्हें मिल जाता है। जब राजा को पता चला कि इस कामधेनु गाय के कारण ही ऋषि जमदग्नि संसाधन जुटाने में सक्षम थे, तो सहस्त्रबाहु उस गाय को पाने के लिए लालची हो गए।

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उन्होंने ऋषि से कामधेनु गाय मांगी, लेकिन ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु गाय देने से इनकार कर दिया। इस पर सहस्त्रबाहु क्रोधित हो गए और उन्होंने ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी।

भगवान परशुराम ने की सहस्त्रबाहु की हत्या
जब परशुराम को पता चला कि सहस्त्रबाहु ने कामधेनु गाय को पाने के लिए उनके पिता ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी है, तो उन्होंने सहस्त्रबाहु की सभी भुजाएं काट कर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद, परशुराम ने कठोर तपस्या करके अपने पिता जमदग्नि को जीवनदान दिया।

जीवित होने के बाद जब ऋषि को पता चला कि परशुराम ने सहस्त्रबाहु का वध कर दिया है, तो उन्होंने इसका पश्चाताप करने के लिए परशुराम से भगवान शिव का जलाभिषेक करने को कहा।

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अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, परशुराम कई किलोमीटर नंगे पैर चले, गंगा जल लाए और आश्रम के पास एक शिवलिंग स्थापित किया, महादेव का महाभिषेक किया और उनकी स्तुति की। तभी से सावन के महीने में नंगे पैर चलकर कावड़िए पवित्र स्थान से जल भरकर लाते हैं और शिव जी का अभिषेक करते हैं।

डिसक्लेमर

‘इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।’

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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