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Success Story : हर घर में सफलता की चमक, छत्तीसगढ़ का यह गांव बना नोट छापने का केंद्र

रायपुर। छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले का छोटा सा बंदोरा गांव आज पूरे प्रदेश के लिए मिसाल बन गया है। जहां अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन की समस्या गहराती जा रही है, वहीं बंदोरा के लोगों ने अपने परंपरागत हुनर को ही रोज़गार में बदलकर एक शानदार जीत दर्ज की है। यहां के ग्रामीण पैरा से रस्सी बनाकर न केवल अपनी आजीविका चला रहे हैं, बल्कि अपने मजबूत इरादों और संघर्षशीलता से ग़रीबी और बेरोज़गारी पर भी विजय प्राप्त कर रहे हैं।

जी हां , आज सक्ती जिले के मालखरौदा ब्लॉक का बंदोरा गांव आज आत्मनिर्भरता का चमकदार उदाहरण बनकर उभरा है। जहां देशभर के कई गांव रोज़गार के अवसरों के अभाव से जूझ रहे हैं, वहीं बंदोरा के ग्रामीणों ने अपने परंपरागत हुनर को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है। यहां के लोग पीढ़ियों से पैरा से रस्सी बनाकर न सिर्फ आर्थिक मजबूती हासिल कर रहे हैं, बल्कि अपनी जीत की गाथा पूरे प्रदेश में फैला रहे हैं।

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पूरा गांव बना टीम—बच्चों से बुजुर्ग तक जीत की कहानी गढ़ रहे
यहां की सबसे बड़ी खासियत है—एकजुटता और सामूहिक प्रयास। बंदोरा के प्रत्येक घर में जोश और उत्साह दिखाई देता है। बच्चे, महिलाएं, पुरुष और बुजुर्ग—सभी पैरा रस्सी बनाने के काम में अपनी भूमिका निभाते हैं। यही सामूहिक मेहनत गांव को लगातार आगे बढ़ा रही है।

इस बाबत गांव की महिलाओं पुष्पा बाई और ललिता बाई बताती हैं कि यह कला उनके पूर्वजों से मिली धरोहर है। आज यह कला पूरे गांव की आर्थिक रीढ़ बन चुकी है।

150–200 रस्सियों का रोज़ाना उत्पादन
इस मेहनतकश गांव का प्रत्येक परिवार प्रतिदिन 150 से 200 रस्सियां तैयार करता है। बाजार में एक रस्सी की कीमत लगभग एक रुपये है, और बड़ी मात्रा में इसकी मांग बनी रहती है। गर्व की बात यह है कि अब व्यापारी खुद बंदोरा गांव पहुंचकर रस्सी खरीदते हैं। यह दिखाता है कि ग्रामीणों की गुणवत्ता, समर्पण और ईमानदारी ने बंदोरा को एक विश्वसनीय ब्रांड बना दिया है।

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छत्तीसगढ़ से निकलकर ओड़िशा तक फैली पहचान
पहले ग्रामीण कांवड़ लेकर बाजारों में रस्सी बेचने जाते थे, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आज बंदोरा की रस्सी छत्तीसगढ़ के कोने-कोने के साथ ओड़िशा के बाजारों में भी पहुंच रही है।यह विस्तार बताता है कि एक छोटा घरेलू उद्योग भी यदि लगातार मेहनत करे, तो बड़े बाज़ारों में अपनी जगह बना सकता है।

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बरसात खत्म होते ही शुरू होती है नई शुरुआत
बंदोरा में जैसे ही बारिश का मौसम समाप्त होता है, गांव में उत्साह की लहर दौड़ जाती है। लोग फसल कटाई से पहले ही पैरा इकट्ठा कर रस्सी निर्माण का काम शुरू कर देते हैं। निरंतरता और लगन ने इस कार्य को ग्रामीणों के लिए वरदान बना दिया है।

बंदोरा गांव ने दिखाया—इच्छाशक्ति हो तो छोटी मेहनत भी बड़ी जीत दिला सकती है
इस तरह आज छत्तीसगढ़ के बंदोरा ने साबित कर दिया है कि सफलता बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि बड़े इरादों से मिलती है। आज यह गांव सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी विजेता गांव बन लोगों के लिए मेहनत की मिसाल बन चुका है।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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