खदानों में प्रति टन के एवज में लिया जा रहा पैसा एसईसीएल के अधिकारियों की मिलीभगत…

कोरबा। एसईसीएल की कोरबा जिले में संचालित कोरबा क्षेत्र की सरायपाली खदान में शुक्रवार की रात जो घटनाक्रम घटित हुआ, वह कोयला अधिकारियों के लिए बहुत बड़ा सबक है। साथ ही साथ यह समझने के लिए भी काफी है कि वे अपनी कमीशनखोरी की आदतों से बाज आएं। इनकी कमीशनखोरी और चुनिंदा लोगों से खास सेवा कराते हुए उन्हें खदान में संरक्षण देने की आदत दूसरे खदानों में भी गैंगवार करा सकती है।
शुक्रवार रात खदान की लोडिंग प्वाइंट में वाहन ले जाने को लेकर भड़का विवाद जानलेवा हो गया। बात तोइस लिए बिगड़ती है कि पैसा लेने के बाद भी रोक-टोक की जाती है, और तवज्जो नहीं मिलता जिसके कारण मनमुटाव बढ़ता है। इसके लिए ये कहना बिल्कुल गलत नही है कि एसईसीएल के अधिकारी की वजह से मामला बिगड़ रहा था। इस तरह के हालात एसईसीएल की कोरबा, मानिकपुर, कुसमुंडा, गेवरा- दीपका खदान में भी बने हुए हैं।
इस बात में कोई संदेह नहीं कि एसईसीएल के महाप्रबंधक, मुख्य महाप्रबंधक, खान प्रबंधक से लेकर लोडिंग साइट पर मौजूद रहने वाले जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी की सांठगांठ रहती है। रसूखदार के बल पर कई अधिकारी-कर्मी वर्षो से परियोजना में जमे रहकर करोड़ों का खेल करते आ रहे है। फिर चाहे वह कोयला हो या चंद ट्रांसपोर्टरों के वाहनों में डीजल की अफरा-तफरी ।
कोयला खदान के सूत्र बताते हैं कि जिले के सभी खदानों में रोडसेल का काम करने वाले ट्रांसपोर्टरों से कोयला उठाव के एवज में प्रति टन 10 रुपये का रेट फिक्स कर दिया गया है। कुछ मौकों पर यह कीमत 15 रुपए प्रति टन तक हो जाती है लेकिन 10 रुपए से नीचे रेट कभी नहीं गिरा।
कोयला उठाव के लिए डिमांड आडर प्राप्त करने वाले को कोयला उठाव के एवज में प्रति टन 10 रुपए के मान से पूरी रकम एडवांस में जमा कराने के बाद ही अनुमति आदेश प्राप्त होता है। अनुमति आदेश पर हस्ताक्षर किया जाता है इसके बाद ही लोडिंग पॉइंट से कोयला उठाने की अनुमति मिलती है,अन्यथा नहीं।
सूत्र बताते हैं कि खदान क्षेत्र में सुरक्षा के नाम पर जवानों की सिर्फ उपस्थिति दर्ज होती है लेकिन वह भी धीरे-धीरे इसी रंग में रंगने लगे हैं। कोयला की आपूर्ति में गुणवत्ता का भी खेल जमकर खेला जा रहा है। कुसमुंडा की खदान में पहले भी मारपीट की घटनाएं हो चुकी हैं, दीपका खदान भी इससे अछूता नहीं रहा है,



