625 साल पहले भी राजधानी था रायपुर, संग्रहालय में मिले ऐतिहासिक प्रमाण…

Raipur Museum History: Mahant Ghasidas Memorial Museum केवल एक संग्रहालय नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सदियों पुरानी सभ्यता, संस्कृति और सत्ता का जीवंत दस्तावेज है। देश का 9वां और मध्यभारत का दूसरा सबसे पुराना संग्रहालय आज भी अपने भीतर कई ऐसे ऐतिहासिक रहस्य समेटे हुए है, जो रायपुर के गौरवशाली अतीत को उजागर करते हैं।

साल 1875 में स्थापित यह संग्रहालय आज 150 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर चुका है। इंटरनेशनल म्यूजियम डे के अवसर पर एक बार फिर यह संग्रहालय चर्चा में है, क्योंकि यहां सुरक्षित दुर्लभ धरोहरें यह प्रमाणित करती हैं कि रायपुर केवल आधुनिक राजधानी नहीं, बल्कि सदियों पहले भी सत्ता, संस्कृति और आस्था का प्रमुख केंद्र था।
625 साल पहले भी राजधानी था रायपुर
संग्रहालय में सुरक्षित विक्रम संवत 1458 के एक महत्वपूर्ण शिलालेख में रायपुर का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह शिलालेख कलचुरी शासक हरिब्रह्मदेव के शासनकाल का माना जाता है। इसमें उनके नायक हाजिराज द्वारा खारून नदी तट पर हटकेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना का उल्लेख किया गया है।
आज यह स्थान महादेव घाट के नाम से प्रसिद्ध है। शिलालेख की 10वीं पंक्ति में “रायपुर” शब्द अंकित है, जो इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण माना जा रहा है कि उस समय भी रायपुर कलचुरी शासन की राजधानी था।
दूसरी सदी का दुर्लभ काष्ठ स्तंभ
संग्रहालय की सबसे अनोखी धरोहरों में जांजगीर-चांपा जिले के किरारी गांव से मिला काष्ठ स्तंभ-लेख शामिल है। सातवाहन कालीन ब्राह्मी लिपि में लिखा यह अभिलेख दूसरी सदी ईस्वी का माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह पूरे भारत में अपनी तरह का एकमात्र दुर्लभ काष्ठ स्तंभ-लेख है। लगभग 20 से 22 अक्षरों वाले इस अभिलेख में तत्कालीन अधिकारियों और सेनापतियों का उल्लेख मिलता है। इतिहासकारों का मानना है कि उस दौर में तालाब निर्माण के दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए जाते थे और यह स्तंभ उसी परंपरा का हिस्सा था।
शिव-पार्वती विवाह की दुर्लभ प्रतिमा
रतनपुर क्षेत्र से मिली “कल्याणसुंदर” प्रतिमा संग्रहालय का प्रमुख आकर्षण है। इसमें भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का अद्भुत चित्रण दिखाई देता है। हालांकि समय के प्रभाव से प्रतिमा का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है, लेकिन इसकी शिल्पकला आज भी लोगों को आकर्षित करती है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतिमा लगभग 800 से 1200 वर्ष पुरानी है और रतनपुर क्षेत्र में खनन के दौरान मिली थी।
दशावतार वाली विष्णु प्रतिमा
संग्रहालय में 12वीं सदी की भगवान विष्णु की दुर्लभ प्रतिमा भी सुरक्षित है। काले पत्थर पर उकेरी गई इस प्रतिमा में भगवान विष्णु को चक्र और गदा धारण किए हुए दर्शाया गया है। प्रतिमा के चारों ओर दशावतार का बारीक चित्रण इसकी विशेषता माना जाता है।

शाही अस्त्र-शस्त्र और दुर्लभ मूर्तियां
संग्रहालय में महंत घासीदास द्वारा भेंट किए गए सोने-चांदी की नक्काशी वाले शाही अस्त्र-शस्त्र भी संरक्षित हैं। इसके अलावा “बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो” संदेश देने वाली तीन बंदरों की दुर्लभ पत्थर प्रतिमाएं भी यहां मौजूद हैं, जो 16वीं या 17वीं शताब्दी की मानी जाती हैं।

आज यह संग्रहालय केवल इतिहास प्रेमियों के लिए नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी अपने गौरवशाली अतीत को समझने का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।



