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बोर्ड परिणाम में जांजगीर-चांपा फिर फिसड्डी, जिम्मेदारों की लापरवाही से 32वें पायदान पर सिमटा जिला, करोड़ों खर्च के बावजूद नहीं सुधरी शिक्षा की गुणवत्ता, सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल

जांजगीर-चांपा। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा बुधवार को जारी 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षा परिणाम 2026 ने जांजगीर-चांपा जिले की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। प्रदेश के 33 जिलों में से 32वें स्थान पर पहुंचा यह जिला एक बार फिर अपनी खराब शैक्षणिक स्थिति के कारण सुर्खियों में है। सबसे गंभीर बात यह है कि यह स्थिति कोई पहली बार नहीं बनी, बल्कि लगातार गिरते परिणामों के बावजूद जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली में कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आ रहा।

10वीं बोर्ड परीक्षा में जिले का परिणाम लगभग 59.90 प्रतिशत के आसपास सिमट गया, जबकि 12वीं में भी करीब 65.73 प्रतिशत के साथ जिला निचले पायदान पर ही रहा। दूसरी ओर प्रदेश के कई जिलों ने 90 प्रतिशत से अधिक परिणाम देकर शिक्षा के स्तर में सुधार का उदाहरण पेश किया है। ऐसे में जांजगीर-चांपा का लगातार पिछड़ना सीधे तौर पर सिस्टम की विफलता को दर्शाता है।

जिले में शिक्षा गुणवत्ता सुधारने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं।एनजीओ के माध्यम से विभिन्न कार्यक्रम, ‘निरंतर शिक्षा गुणवत्ता प्रशिक्षण अभियान’, शिक्षकों के प्रशिक्षण, विशेष कक्षाएं और मॉनिटरिंग के दावेये सब कागजों में तो प्रभावशाली दिखते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की सच्चाई उजागर कर रही है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इन योजनाओं का लाभ विद्यार्थियों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है।

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सबसे बड़ा सवाल शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की मॉनिटरिंग व्यवस्था पर खड़ा हो रहा है। यदि नियमित निरीक्षण, समीक्षा बैठकें और फीडबैक सिस्टम सही तरीके से काम कर रहे होते, तो जिले की यह स्थिति नहीं होती। कई स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बेहद कमजोर बताया जा रहा है, जहां न तो समय पर पाठ्यक्रम पूरा हो पाता है और न ही कमजोर छात्रों के लिए कोई विशेष रणनीति बनाई जाती है।

शिक्षकों की जवाबदेही भी इस पूरे मामले में सवालों के घेरे में है। कई जगहों पर शिक्षकों की अनुपस्थिति, समय पर कक्षाएं न लगना और पढ़ाई के प्रति लापरवाही जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन इन पर ठोस कार्रवाई का अभाव दिखाई देता है। जब शिक्षक ही अपनी जिम्मेदारी गंभीरता से नहीं निभा रहे, तो छात्रों से बेहतर परिणाम की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

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ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की स्थिति तो और भी चिंताजनक है। वहां बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षकों की कमी और विद्यार्थियों की अनियमित उपस्थिति जैसे मुद्दे वर्षों से जस के तस बने हुए हैं। इसके बावजूद इन समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस और प्रभावी पहल नजर नहीं आती।

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जिले के अभिभावकों और शिक्षा से जुड़े लोगों में भी इस परिणाम को लेकर नाराजगी साफ देखी जा रही है। उनका कहना है कि हर साल योजनाओं और सुधार के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन परिणाम के समय सच्चाई सामने आ जाती है। यह केवल विद्यार्थियों की असफलता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है।

सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या केवल छात्र और शिक्षक ही इसके लिए दोषी हैं, या फिर शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और मॉनिटरिंग से जुड़े अधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते? जब करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद परिणाम नहीं सुधर रहे, तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं।

बहरहाल, अब जरूरत है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जाए। केवल योजनाएं बनाना और बैठकें करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जांजगीर-चांपा का शिक्षा स्तर और भी नीचे गिर सकता है, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर यहां के विद्यार्थियों को भुगतना पड़ेगा।

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करोड़ों खर्च, फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात

• हर साल शिक्षा सुधार के नाम पर करोड़ों का बजट खर्च
• एनजीओ और ‘निरंतर शिक्षा गुणवत्ता प्रशिक्षण’ जैसे अभियान जारी
• कागजों में योजनाएं प्रभावी, जमीनी स्तर पर नाकाम
• न मॉनिटरिंग का असर, न प्रशिक्षण का फायदा दिखा

सवाल: आखिर पैसा कहां खर्च हो रहा है और उसका परिणाम क्यों नहीं दिख रहा?

सिस्टम की 5 बड़ी खामियां

• स्कूलों में कमजोर पढ़ाई और अधूरा पाठ्यक्रम
• शिक्षकों की अनुपस्थिति और लापरवाही
• कमजोर छात्रों के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं
• ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों और संसाधनों की भारी कमी
• मॉनिटरिंग और जवाबदेही पूरी तरह फेल

नतीजा: हर साल गिरता प्रदर्शन, बढ़ती चिंता

आखिर कौन है जिम्मेदार?

• शिक्षा विभाग – योजनाएं बनाकर छोड़ देना
• जिला प्रशासन – कमजोर निगरानी व्यवस्था
• शिक्षक – जिम्मेदारी में लापरवाही के आरोप
• सिस्टम – जवाबदेही तय करने में पूरी तरह नाकाम

सवाल: जब सबकी भूमिका है, तो जवाबदेही तय क्यों नहीं?

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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