25 साल पुरानी हरिभरी शासकीय उद्यान पंचायत और राखड़ माफियाओं के प्रकोप में, 12 हजार टन से अधिक राखड़ का किया गया है दस एकड़ उद्यान के समीप डंप, पर्यावरण व ग्राम पंचायत अनुमति संदेह के दायरे में…

25 साल पुरानी हरिभरी शासकीय उद्यान पंचायत और राखड़ माफियाओं के प्रकोप में
12 हजार टन से अधिक राखड़ का किया गया है दस एकड़ उद्यान के समीप डंप
पर्यावरण व ग्राम पंचायत अनुमति संदेह के दायरे में
सक्ति-जैजैपुर-कचंदा। सन 1980-82 से कचंदा उद्यान मुख्य रूप से क्षेत्र के प्राकृतिक पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण की रक्षा के उद्देश्य से स्थापित किया गया है ताकि क्षेत्र में शुद्ध वातावरण और प्राकृतिक आपदा जैसी समस्याओं निजात पाया जा सके। एक तरफ पर्यावरण दिवस आते ही क्षेत्र व गांव के जनप्रतिनिधि वृक्षारोपण कर अपने आप को पर्यावरण हितेषी बताकर आमजनों को वृक्षारोपण करने की सलाह देते फिरते रहते हैं और सोशल मीडिया में अपने आप को पर्यावरण संरक्षक बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते दूसरी तरफ वही जनप्रतिनिधि पर्यावरण को तबाह करने के लिए चंद रुपयों के लिए राखड़ माफिया के सौदागरओ से मिल कर राखड़ के प्रकोप में ग्रामीणों को जूझने के लिए छोड़ देते हैं।
प्लांटों से निकलने वाले राखड़ डंप करने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है
पर्यावरण विभाग के तय अनुमति के आधार से अधिक भारी मात्रा में डंप किया जा रहा है तय स्थान से लेकर अनेक स्थानों पर अवैध तरीके से सड़कों, खेतों और शासकीय जमीन में मनमाने तरीके से राखड़ हजारों टन डंप किया जा रहा है। स्थानीय प्रशासन इस पर रोक लगाने कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है । जिसका खामियाजा आमजनों को भुगतना पड़ रहा है।कहीं पूरे तालाब को पाटने के लिए सैकड़ों ट्रक राखड़ गिराया जा रहा है तो कही कमीशन के लालच में सरपंचों द्वारा ग्राम पंचायत में खाली पड़ी शासकीय जमीन पर राखड़ के सौदागरओ से मिलीभगत कर ग्राम पंचायत से अनुमति देकर ग्रामीणों के जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इसके चलते क्षेत्र में धूल के गुबारे उड़ रहा है। लोगों को आवागमन में परेशानी हो रही है।लोगों को सांस व त्वचा संबंधी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। ज्ञात हो कि हाल ही में क्षेत्रीय अधिकारी छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ने कार्रवाई करते हुए आरकेएम पावरजेन लिमिटेड उधापिंडा को 89 लाख 40 हजार रुपए जुर्माना लगाया गया था। मगर इस पर आपत्ति जताते हुए अधिकारियों ने इसे निराधार बताया है और उच्चाधिकारियों को आवेदन दिया था। प्रशासन की सख्ती नहीं होने के कारण कई कंपनी का राखड़ अब भी जगह-जगह पर डाला जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि ग्राम पंचायत कचंदा के शासकीय उद्यान रोपड़ी के पास पंचायत की खाली जमीन जो कि लगभग 3-4 एकड़ पर पंचायत द्वारा 20000 से 25000 टन राखड़ गिराने का कॉन्ट्रैक्ट राखड़ के कांट्रेक्टर रोहित रात्रे को दिया गया है। बात दे कचंदा पंचायत के द्वारा खाली मैदान में जहाँ बच्चे स्वक्ष वातावरण को देख कर खेल खेलने जाते थे वहाँ 10 से 15 हजार टन राखड़ डाला गया है सरपंच के अनुसार 20 से 25 हजार टन का अनुमति दिया गया है। कचंदा उद्यान के 3 फिट की दूरी में 10 से 12 हजार से भी अधिक राखड़ डालने के वजह से उद्यान में लगे पेड़ पौधे बागवानी फल राखड़ के प्रकोप से नष्ट हो जाएगी, बारिश के रसाव से जमीन की उर्वरक शक्ति खत्म होकर उपजाऊ नही रहेगी, जमीनि धरातल से होकर उद्यान में लेगए पेड़ पौधे,बागवानी फल,फूल बंजर में तब्दील होने में देरी नहीं है। पर्यावरण अनुमति और पंचायत द्वारा दी गई अनुमति की निष्पक्ष जांच की जाए तो निययों के विरुद्ध पाई जाएगी?
क्या कहते है पर्यावरण विभाग
पर्यावरण विभाग के नियमानुसार राखड़ डालने वाले स्थान पर राखड़ के साथ गर्मी के दिनों में पानी भी डालना चाहिए ताकि राखड़ सार्वजानिक आवागमन में आमजनों राहगीरों के लिए परेशानी का कारण न बने। इसके साथ प्रभावित गांवों में सफाई और पर्यावरण संरक्षण के उपाय करना चाहिए लेकिन राखड़ की डंपिंग करने वाले पर्यावरण विभाग की गाइडलाइंस को फॉलो नहीं करते।
राख से होती है कई तरह की बीमारियां
हृदय रोग विशेषज्ञ के अनुसार राख हमारे शरीर को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। इससे आंखों की परेशानी सांस, दमा, अस्थमा, एलर्जी के अलावा न्यूयोमोकोनोसिस जैसी जानलेवा बीमारी भी होती है। डॉक्टर की माने तो ने न्यूयोमोकोनोसिस बीमारी से फेफड़ा सूख जाता है और अगर समय पर इलाज नहीं हुआ तो इससे मरीज की मौत भी हो सकती है।



