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पामगढ़ विधानसभा में कांग्रेस-भाजपा में टिकट को लेकर मची होड़, बसपा ने फिर खेला मौजूदा विधायक पर दांव…

पामगढ़ विधानसभा में कांग्रेस-भाजपा में टिकट को लेकर मची होड़
बसपा ने फिर खेला मौजूदा विधायक पर दांव
जांजगीर-चांपा। अजा वर्ग के लिए आरक्षित पामगढ़ विधानसभा में कांग्रेस-भाजपा में टिकट को लेकर होड़ मची हुई है। दोनों ही राष्ट्रीय दलों में उम्मीदवारों की संख्या आधा-आधा दर्जन से अधिक है। ऐसे में दोनों ही पार्टी के सामने टिकट वितरण को लेकर एक तरह से किसी चुनौती से कम नहीं है। जबकि प्रदेश के एकमात्र बसपा का गढ़ कहे जाने वाली विधानसभा में फिर पार्टी ने मौजूदा बसपा विधायक पर दांव खेला है। वहीं यहाँ जनता कॉग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) व आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार भी मैदान में उतरने के कयास लगाए जा रहे हैं।
नवम्बर माह में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी प्रमुख पार्टियां अपने ढंग से चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं। आदर्श आचार संहिता कभी भी लागू हो सकती है ,जिसके चलते चुनावी चर्चा पूरे शबाब है। राज्य में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष समेत आला स्तर के नेतागण जहां, कांग्रेस पिछले चुनाव में हारी थी। उस सीट को कैसे जीता जाए ,जिसके लिए गम्भीर चुनावी मंथन चल रही है। इसी तरह राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा भी प्रदेश स्तर पर अगले माह होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बूथ स्तर पर पार्टी को मजबूत करने के लिए योजना बना रही है। चूँकि पामगढ़ विधानसभा बहुजन समाज पार्टी का गढ़ माना जाता है। जातिगत आधार पर देखा जाए तो विधानसभा में बसपा की अपनी अलग पैठ नजर आती है। यह प्रदेश की एकमात्र विधानसभा है, जहां बसपा का वोट बैंक आज भी बरकरार है। इस विधानसभा की चुनावी इतिहास को देखा जाए तो वर्ष 1990 के पूर्व यह सीट कांग्रेस के गढ़ माना जाती थी, परंतु 1990 में बसपा के दाऊराम रत्नाकर पहली विधायक बने। उसके बाद हुए दो चुनाव में भी वे विधायक बनने में कामयाब रहे। इस तरह दाऊराम रत्नाकर क्षेत्र से लगातार तीन बार विधायक रहे। वर्ष 2003 में कांग्रेस ने नया प्रयोग करते हुए शिवरीनारायण मठ के महाराज रामसुंदर दास महंत को मैदान में उतारा और वे कांग्रेस को जीत दिलाने में सफल रहे परंतु उसके बाद से पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ रही है। वर्ष 2008 में पुनः बसपा के दूजराम बौद्ध विधायक निर्वाचित हुए। इसी तरह वर्ष 2013 में पहली बार इस सीट से भाजपा के अंबेश जांगड़े विजयी हुए। फिर वर्ष 2018 के चुनाव में बसपा की महिला प्रत्याशी इंदु बंजारे ने कड़े मुकाबले में कांग्रेस के गोरेलाल बर्मन को चुनाव हराकर विधायक बन गई। अगले माह होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए दोनों ही राष्ट्रीय दलों को टिकट के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस की बात करें तो ,दो बार के पूर्व प्रत्याशी रहे गोरेलाल बर्मन, पूर्व प्रत्याशी व कांग्रेस नेत्री शेषराज हरबंष, छाया सांसद रवि शेखर भारद्वाज व उनकी बहन रोमा भारद्वाज, पुष्पा पाटले, शकुंतला खरे,पप्पू बघेल समेत दर्जन भर लोग विधानसभा से टिकट की मांग कर रहे हैं। वर्ष 2008 में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे गोरेलाल बर्मन कुल लगभग 20हजार मत मिले थे। जबकि वर्ष 2013 में कांग्रेस प्रत्याशी शेषराज हरबंष को लगभग 35हजार मत मिले। इसी तरह 2018 में कांग्रेस के गोरेलाल बर्मन कड़े मुकाबले में बसपा की इंदु बंजारे से महज तीन हजार के अंतर से चुनाव हारे थे ।गोरेलाल बर्मन को को सीएम का गुट से माना जाता है, जबकि शेषराज हरबंष को विधानसभा अध्यक्ष डॉ चरणदास महंत के गुट के माने जाते हैं। हरबंस क्षेत्र में लगातार सक्रिय नजर आ रही है। और वे लोगों व कार्यकत्ताओं से मिल भी रही है। रवि शेखर भारद्वाज भी सीएम गुट से जाने जाते हैं। हालांकि कांग्रेस में टिकट किसको मिलेगा यह तो समय बताएगा पर यह सीट कांग्रेस के लिए एक तरह से किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। यूँ कहें राजनीति में कांग्रेस के लिए यह सीट प्रयोग शाला बन गई है। राजनीति प्रेक्षकों की बात माने तो इस सीट पर कांग्रेस की हार की प्रमुख वजह गुटबाजी को ही कहा जा सकता है। इसी तरह राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा में भी कई लोग दावेदार है। पूर्व विधायक होने के नाते अंबेश जांगड़े की दावेदारी स्वाभाविक ही है लेकिन वे पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे थे जिस पर पार्टी आकलन करेगी। पूर्व सांसद कमला देवी पाटले भी टिकट के लिए लगी हुए हैं। इनके अलावा प्रमुख नामों में संतोष लहरे,सुखराम मधुकर, गुरुदयाल पाटले,संजीव बंजारे व मंजुलता टंडन समेत अन्य के नाम भी है। बसपा ने मौजूदा विधायक इंदु बंजारे के नामों की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। साथ ही जनता कॉग्रेस छत्तीसगढ़ जोगी व आम आदमी पार्टी के भी उम्मीदवार मैदान में हो सकते हैं। बहरहाल पामगढ़ विधानसभा में बसपा ने जहां मौजूदा विधायक को पहले ही मैदान में उतार चुकी है। भाजपा-कॉग्रेस में टिकट को लेकर अभी भी रस्साकशी जारी है। राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस व भाजपा,बसपा के किला को ढहा पाएगी की ,कि नहीं। यह आने वाला समय ही बता पायेगा। इन सब बातों को लेकर राजनीति में चर्चा तेज हो गई है।



