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छत्तीसगढ़जांजगीर-चाम्पा

जिन आयोजनों को बनना था जिले की शान,गिरती चली जा रही उनकी साख, घिसे पीटे लीक व अंगद के पांव की तरह जमें लोगों से मुक्त हो समिति, जाज्वलयदेव महोत्सव के बाद अब बैरिस्टर स्मृति समारोह सवालिया घेरे में, समीक्षा व बदलाव की आवश्यकता…

जिन आयोजनों को बनना था जिले की शान,गिरती चली जा रही उनकी साख

घिसे पीटे लीक व अंगद के पांव की तरह जमें लोगों से मुक्त हो समिति

जाज्वलयदेव महोत्सव के बाद अब बैरिस्टर स्मृति समारोह सवालिया घेरे में

समीक्षा व बदलाव की आवश्यकता

जांजगीर-चांपा। जिन दो आयोजनों को जिले की शान समझा जाना चाहिए था विगत दो दशकों में अंगद की पांव की तरह इनकी समितियों में खूंटा गाड़कर बैठे लोगों ने इसकी साख को गिराने का काम किया है। वर्ष 2023 के बैरिस्टर स्मृति समारोह से आम लोगों को दूर रखकर सफलता पूर्वक सम्पन्न हो जाने का जिन लोग ढिंढोरा पीट रहे हैं वस्तुतः उन्ही
मठाधीशों, दरबारियों व चाटुकारों के हाथों से मुक्त होने के लिए जाज्वलदेव लोक महोत्सव कृषि मेला व स्मृति समारोह मुक्ति के लिए छटपटा रहा है।अब बदलाव व समीक्षा नहीं हुआ तो भविष्य में ये दोनों आयोजन चंद लोगों के स्वार्थ पूर्ति के महज खिलौने बन कर रह जाएंगे। लाखों का ऐसा तमाशा जिसका वास्तविक उद्देश्य कोसों दूर हो जाएगा। आयोजन की निरंतरता नितांत जरूरी है पर यह उद्देश्य परक तभी होगा जब कुछ लोगों के चंगुल से मुक्त हो जिन्होंने 23 वर्षों तक इसे दुधारू गाय की तरह दुहा है। जाज्वल्य देव लोक महोत्सव, बैरिस्टर स्मृति समारोह,जाज्वल्या स्मारिका में नए और युवा सोच को कमान सौंपे जाने की जरूरत है।

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खर्चा सरकार का, वाहवाही व मक्खन इनको
जाज्वलयदेव लोक महोत्सव व बैरिस्टर स्मृति समारोह का खर्चा शासन उठाती है। दोनो आयोजन के लिए कलेक्टर के मार्गदर्शन में समिति बनती है। परंतु कुछ चाटुकारों की मिलीभगत इस दफ्तर के कुछ लोगों से ऐसी है कि मानों दोनो आयोजन इनके बगैर सम्भव नहीं है। ऐसा संदेश शीर्ष अधिकारी तक ये लोग पहुंचाने में कामयाब हो जाते हैं और इनकी दुकानदारी चल निकलती है। काकस बनाकर फिर ये लोग उन्ही सब कार्यो में लग जाते हैं। नेतागिरी में उतरे एक रिटायर्ड आयुर्वेद अधिकारी , एक कथित जनसेवक अकादमी के अध्यक्ष और शिक्षक व साहित्यकार कम परन्तु ऐसे आयोजनों में रसूख बघारने वाले मंच संचालक को इन दोनों आयोजनों से ससम्मान विदाई देना लाजिमी है।
जाज्वल्या केवल विशिष्ट जनों के लिए
जाज्वलयदेव महोत्सव में निकाली जाने वाली स्मारिका का ढोल बहुत पीटा जाता है परंतु पिछली जाज्वल्या स्मारिका कितने लोगों में बंट पाई? क्या ये केवल विशिष्ट लोगों के लिए ही है । वैसे भी हर जाज्वल्या में
घिसे पिटे लेख होते हैं कम से कम इसमें तो कोई नवाचारों की बात नही की गई है। कलेवर से लेकर लेख संपादन सभी में एकरसता से लोग ऊब चुके हैं ।और बदलाव देखना चाहते है। विमोचन के बाद स्मारिका बंट नहीं पाती व बाबुओं की आलमारी में सड़ते पड़ी रहते हैं। लापरवाही के आलम यहां तक है कि जाज्वल्या की पुरानी प्रतियां तक संरक्षित नहीं है। सूत्रों के अनुसार 15,16 साल पहले के अंक अंत मे कबाड़ कर रद्दी के भाव मे भेजे गए हैं। 100 प्रतियां विमोचन के दौरान भी नहीं बंटी?आखिर कितनी प्रतियां छपती है कितनी आम जनता को बाँटी जाती है ये शोध का विषय है।
बच्चे तरस जाते हैं सर्टिफिकेट मोमेंटो के लिए
लोक महोत्सव व बैरिस्टर समारोह में में स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन का दावा खोखला दिखता है बाहर से आये कलाकारों को लाखों का भुगतान ,महंगे होटलों में लजीज भोजन व रूम आने जाने के लिए किराया लक्जरी गाड़ियां मिलते हैं परन्तु स्कूली बच्चों के एक सर्टिफिकेट तक नही। 20-25 के ग्रुप में प्रस्तुति करने वाले स्कूली बच्चों को केवल एक सर्टिफिकेट थमाया जाता है।मोमेंटो भले ही अलमारियों में टूटते फुटते रहें पर बच्चो को नहीं देंगे।चंद कर्मचारियों के कब्जे में शाल श्रीफल व मोमेंटो व भोजन कूपन रहते हैं। बच्चों व शिक्षकों को दुत्कारा जाता है। जाज्वल्य देव में तो यह परम्परा इसके स्वयं भू कर्ता धर्ता एक आयुर्वेद के रिटायर अधिकारी ने स्थापित कर ही दी है। स्थानीय कलाकारों का चयन भी वे अपनी मनमर्जी से करते हैं।
कब तक चलेगी इनकी मनमर्जी
इस बार बैरिस्टर महोत्सव में भी बच्चों व प्रतिभाओं को पुरस्कार के लिए बुलाया गया था। इसमें भी हॉकी के राष्ट्रीय खिलाड़ियों को पूछा तक नहीं गया। मतलब इनकी मर्जी से ही सब चलेगा। किसी तरह हॉकी के पदाधिकारियों ने सख्त लहजे में बात रखी तो फिर ये माने। प्रतिभाओं को पुरस्कृत करने में भी इनका नेपोटिज़्म हावी रहता है।
प्रशासन करे ये पहल
-इन कार्यक्रमों के बाद खुली समीक्षा की जानी चाहिए जिसमें कार्यक्रम के सभी पहलू पर बात हो व अगले कार्यक्रम में कमियों को कम किया जा सके।
-दोनो कार्यक्रमों की समिति कम से कम 6 माह पूर्व बन जाये जिसकी कम से कम 6 बैठक हो जो उत्तरोत्तर कार्यक्रम की तैयारियों पर केंद्रित हो।
– हर वर्ष समिति में नए लोगों को शामिल किया जाए व नवाचार शामिल हो। इन कार्यक्रमों की एकरसता ने आम जनता को दूर कर दिया है।
-राजनीतिक क्षेत्र से इतर समाज सेवा,साहित्य,शिक्षा,पत्रकारिता से जुड़े युवा सोच के लोगों को आयोजन की बागडोर सौंपी जाय।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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