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नंदी ने रावण को क्यों दिया था श्राप? रामायण के इस प्रसंग ने बदल दिया था लंका का भाग्य

Nandi Curse to Ravana: नंदी का रावण को श्राप रामायण के सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक माना जाता है। सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथ वाल्मीकि रामायण में इस घटना का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि इसी श्राप ने आगे चलकर रावण और उसकी सोने की लंका के विनाश की भूमिका तैयार की थी।

नंदी का रावण को श्राप मिलने की कथा उस समय की है जब लंकापति रावण भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पर्वत पहुंचा था। रावण स्वयं को अत्यंत शक्तिशाली और विद्वान मानता था। इसी अहंकार में उसने वहां मौजूद भगवान शिव के परम भक्त नंदी का अपमान कर दिया।कथा के अनुसार रावण ने नंदी के स्वरूप का मजाक उड़ाते हुए उनका उपहास किया और उन्हें वानर जैसा बताया।

नंदी को आया क्रोध
रावण की बात सुनकर नंदी का रावण को श्राप देने वाला प्रसंग सामने आया। नंदी भगवान शिव के अनन्य भक्त और कैलाश के द्वारपाल माने जाते हैं। रावण के अपमानजनक व्यवहार से वे क्रोधित हो गए। क्रोध में नंदी ने रावण से कहा कि जिस वानर रूप का वह आज उपहास कर रहा है, एक दिन वही वानर उसके कुल और उसके साम्राज्य के विनाश का कारण बनेंगे।

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कैसे सच हुआ नंदी का श्राप?
नंदी का रावण को श्राप त्रेतायुग में सत्य साबित हुआ। जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तब भगवान श्रीराम ने वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई की।हनुमान जी, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान और असंख्य वानरों ने युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः भगवान श्रीराम के हाथों रावण का वध हुआ और लंका का साम्राज्य ध्वस्त हो गया।इसी घटना को नंदी के श्राप की सिद्धि माना जाता है।

रामायण में कहां मिलता है वर्णन?
नंदी का रावण को श्राप का उल्लेख वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में मिलता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार यह प्रसंग उत्तरकांड के 16वें सर्ग में वर्णित है।यह कथा अहंकार के परिणाम और संतों तथा भक्तों के सम्मान का महत्व भी बताती है।

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कौन थे नंदी?
नंदी का रावण को श्राप समझने के लिए नंदी के महत्व को जानना भी जरूरी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नंदी भगवान शिव के वाहन और उनके प्रमुख गण हैं।वे कैलाश पर्वत के मुख्य द्वारपाल माने जाते हैं और शिव-पार्वती के निवास की रक्षा करते हैं।

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महर्षि शिलाद के पुत्र थे नंदी
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार नंदी का रावण को श्राप देने वाले नंदी महर्षि शिलाद के पुत्र थे। कहा जाता है कि महर्षि शिलाद ने संतान प्राप्ति के लिए कठोर तप किया था।भगवान शिव की कृपा से उन्हें एक दिव्य बालक प्राप्त हुआ, जिसका नाम नंदी रखा गया।

नंदी की पूजा का महत्व
नंदी का रावण को श्राप केवल एक कथा नहीं बल्कि शिव भक्ति का भी प्रतीक है। शिव मंदिरों में नंदी की प्रतिमा हमेशा शिवलिंग की ओर मुख करके स्थापित की जाती है।मान्यता है कि नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहने से वह सीधे भगवान शिव तक पहुंचती है। इसलिए शिव पूजा में नंदी की पूजा को भी विशेष महत्व दिया जाता है।

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कथा से मिलने वाली सीख
नंदी का रावण को श्राप हमें यह संदेश देता है कि अहंकार व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है। रावण अत्यंत विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसका घमंड ही उसके विनाश की वजह बना।धार्मिक दृष्टि से यह प्रसंग विनम्रता, सम्मान और भक्ति के महत्व को दर्शाता है।

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और उपलब्ध ग्रंथों में वर्णित प्रसंगों पर आधारित है। विभिन्न परंपराओं और मान्यताओं में कथाओं के विवरण अलग-अलग हो सकते हैं। पाठक इसे आस्था और धार्मिक संदर्भ के रूप में ही देखें।

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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