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पहरिया पाठ — जहां सालभर रहती है हरियाली, आस्था और प्रकृति का अनोखा संगम*जहां लकड़ी काटना माना जाता है अशुभ

जांजगीर-चांपा। जिले के बलौदा ब्लॉक में स्थित छोटा सा गांव पहरिया अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था के लिए दूर-दूर तक जाना जाता है। पहाड़ियों से घिरे इस गांव के “पहरिया पाठ” में साल के बारहों महीने हरियाली छाई रहती है। खास बात यह है कि यहां के ग्रामीण इस पहाड़ से लकड़ी नहीं काटते, जिससे जंगल की हरियाली आज भी पूरी तरह सुरक्षित है। लोग इसे प्रकृति प्रेम के साथ-साथ वन देवी मां अन्नधरी की कृपा मानते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, अगर किसी को लकड़ी की जरूरत भी होती है तो पहले मां अन्नधरी से अनुमति मांगी जाती है। मान्यता है कि बिना अनुमति लकड़ी काटना अशुभ माना जाता है। यही कारण है कि यह जंगल आज भी घना और हरा-भरा बना हुआ है। यहां से गुजरने वाले राहगीर भी एक बार रुककर इस प्राकृतिक सौंदर्य को देखने जरूर ठहरते हैं।

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हरियाली के साथ जुड़ी हैं आस्था

🌿 हरियाली के साथ जुड़ी आस्था
पहरिया गांव चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है, जिन्हें स्थानीय लोग “पहरी” कहते हैं। गर्मी, बारिश या सर्दी—हर मौसम में यहां हरियाली बनी रहती है। ग्रामीण इसे मां अन्नधरी का आशीर्वाद मानते हैं। गांव में यह भी मान्यता है कि माता की कृपा से यहां कोई भी परिवार निःसंतान नहीं रहा और हर घर में संतान सुख मिला है।

क्यों पड़ा माता अन्नधरी का नाम

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🙏 अन्नधरी माता नाम पड़ने की कथा
स्थानीय मान्यता के अनुसार, एक समय गांव में अकाल जैसी स्थिति हो गई थी और लोगों के घरों में अन्न नहीं बचा था। तभी एक बुजुर्ग महिला गांव में आईं, जिनके पास धान से भरी टोकनी थी। उन्होंने हर घर को एक-एक मुट्ठी अन्न दिया। बाद में लोगों ने उस बुजुर्ग महिला को देवी का रूप मानते हुए उनका नाम “अन्नधरी माता” रखा। तब से ग्रामीण उनकी पूजा करते आ रहे हैं।

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⛰️ भाई देवपाठ को माना जाता है संरक्षक

अन्नधरी माता के ठीक नीचे उनके भाई देवपाठ विराजमान हैं, जिन्हें माता का संरक्षक माना जाता है। ग्रामीण प्रतिदिन सुबह-शाम माता अन्नधरी और भाई देवपाठ की पूजा करते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

नवरात्रि में लगता हैं नौ दिनों तक भव्य मेला

🎪 नवरात्रि में लगता है भव्य मेला
हर साल नवरात्रि पर यहां नौ दिनों तक भव्य मेला लगता है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस दौरान मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं और श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क भोजन-प्रसाद की व्यवस्था रहती है।
पहरिया पाठ न केवल प्राकृतिक सुंदरता का उदाहरण है, बल्कि यह आस्था और पर्यावरण संरक्षण का अनोखा संदेश भी देता है। यहां के ग्रामीणों की परंपरा आज भी प्रकृति को बचाने की प्रेरणा देती है।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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