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पीएचडी डिग्री प्राप्त कर डॉ. राकेश राठौर ने परिवार को किया गौरवांवित

जांजगीर-चांपा। किसी भी व्यक्ति के जीवन में शिक्षा केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह ज्ञान, अनुभव और विचारों के गहन विकास की यात्रा होती है। इसी यात्रा में डॉ.राकेश राठौर का शोध विषय “21 वीं सदी के हिन्दी साहित्य में वृद्ध विमर्श” रहा, जो आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण और प्रासंगिक माना जाता है। अपने शोध कार्य में उन्होंने न केवल नई दृष्टि प्रस्तुत की, बल्कि उस क्षेत्र में मौजूद चुनौतियों को समझते हुए सार्थक समाधान भी सुझाए।

पीएचडी की यात्रा आसान नहीं होती। कई वर्षों तक निरंतर अध्ययन, शोध-पत्रों का विश्लेषण, प्रयोग, लेखन और समीक्षाओं की प्रक्रिया किसी भी शोधार्थी के धैर्य और समर्पण की सच्ची परीक्षा लेती है। डॉ. राकेश राठौर ने अपने मार्गदर्शक प्रो. डॉ. आँचल श्रीवास्तव जी के निर्देशन में तथा डॉ. रेखा दुबे जी के आशीर्वाद से इस कठिन यात्रा को पूरा किया। शोध प्रक्रिया के दौरान चुनौतियाँ अनेक थीं लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयासों ने उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया।

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उनकी इस प्राप्ति में परिवार का योगदान उल्लेखनीय रहा। डॉ. राकेश राठौर के पिता श्री रामेश्वर राठौर (शिक्षक) माता श्रीमती शारदा राठौर एवं बहन रश्मि राठौर, ऋतु राठौर, प्रकाश राठौर जीजा, स्वामी सुरेंद्र नाथ,संजीव पाठक, विवेक राठौर, सेवक राम राठौर, और मित्रों ने हर कदम पर उनका मनोबल बढ़ाया। परिवार के सहयोग के बिना ऐसी लंबी और थकाऊ यात्रा संभव नहीं होती। इस सफलता के साथ- साथ परिवार के पहले पी एचडी धारक भी बने।

शैक्षणिक जगत में शोध कार्य किसी भी विद्वान की गहरी समझ, विश्लेषण क्षमता और ज्ञान–समर्पण का प्रमाण होता है। इसी क्रम में हमारे क्षेत्र के प्रतिभाशाली युवा शोधकर्ता डॉ.राकेश राठौर ने अन्य और भी महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उनके 10 से अधिक शोध-पत्र देश के प्रतिष्ठित UGC-CARE Listed तथा Peer-Reviewed जर्नलों में प्रकाशित हो चुके हैं। वहीं Peer-reviewed और UGC-CARE Listed जर्नलों में प्रकाशन से उनके शोध की विश्वसनीयता और अकादमिक महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। डॉ.राकेश राठौर ने अपने शोध- पत्रों में विविध विषयों को समाहित किया है, जिनमें विकलांग विमर्श, आदिवासी लोक जीवन, वृद्ध जीवन,जैसे महत्वपूर्ण और समसामयिक मुद्दे भी शामिल हैं। इसके साथ-साथ इन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय बिलासपुर से एम.ए. हिन्दी साहित्य विषय में 80 प्रतिशत के साथ गोल्ड मेडल लिस्ट में पांचवा स्थान प्राप्त किया था। यह उपलब्धि उन्हें न केवल शोध के क्षेत्र में नई पहचान दिलाती है, बल्कि उनके उज्ज्वल भविष्य की भी मजबूत नींव स्थापित करती है।
शोध पत्र का प्रकाशन केवल लेखन का परिणाम नहीं होता, बल्कि महीनों की मेहनत, डेटा विश्लेषण, साहित्य समीक्षा और प्रयोगात्मक कार्य का संपूर्ण संयोजन होता है। डॉ.राकेश ने धैर्य और दृढ़ता के साथ इन सभी चरणों पर काम किया। शोध–पत्र तैयार करने से लेकर उसके प्रकाशन तक की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण होती है, जिसमें कई बार संशोधन, समीक्षा और पुनः प्रस्तुतिकरण की लंबी यात्रा शामिल होती है। लेकिन डॉ.राकेश ने हार न मानते हुए एक–एक शोध–पत्र को उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा उतरने लायक बनाया।

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आज जब देश में गुणवत्तापूर्ण शोध कार्य की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है, ऐसे समय में निस्संदेह, पीएचडी की उपाधि प्राप्त करना केवल एक डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, धैर्य और लगन का परिणाम है। डॉ. राकेश राठौर की यह उपलब्धि उनके उज्ज्वल भविष्य की नींव है और परिवार के लिए गर्व का विषय भी।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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