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छत्तीसगढ़ HC का बड़ा फैसला, विकलांगता प्रमाण पत्र पर SDM का अधिकार नहीं

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने विकलांगता प्रमाण पत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जो भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बन सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी दिव्यांगता प्रमाण पत्र की वैधता और उसकी प्रामाणिकता तय करने का अधिकार केवल चिकित्सा बोर्ड के पास है, न कि किसी राजस्व अधिकारी के पास।

क्या है मामला?
यह मामला महासमुंद जिले के निवासी बिहारी पटेल से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2010 में 45.4 प्रतिशत श्रवण बाधित होने के आधार पर सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिली थी। यह प्रमाण पत्र जिला चिकित्सा बोर्ड द्वारा जारी किया गया था।

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पारिवारिक विवाद से शुरू हुई जांच
साल 2017 में जमीन विवाद के चलते उनके भाई ने आरोप लगाया कि नौकरी पाने के लिए प्रमाण पत्र फर्जी तरीके से बनवाया गया है। इस शिकायत के बाद कलेक्टर ने SDM को जांच के निर्देश दिए।

SDM ने किया प्रमाण पत्र अमान्य
जांच के बाद SDM ने प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित कर दिया और शिक्षक पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश भी की। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला हाई कोर्ट पहुंचा।

हाई कोर्ट का अहम फैसला
जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि SDM को ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वह मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी प्रमाण पत्र को निरस्त कर सके। कोर्ट ने ‘दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016’ की धारा 52 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि इसके लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया ही अपनाई जानी चाहिए।

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कोर्ट के निर्देश
हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि संबंधित प्रमाण पत्र तुरंत याचिकाकर्ता को वापस सौंपा जाए और भविष्य में ऐसे मामलों में नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

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इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि दिव्यांगता से जुड़े मामलों में केवल विशेषज्ञ संस्थान ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं, जिससे अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होगी।

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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