हॉट सीट कुनकुरी :”माहौल” के अंदर का माहौल” जानिए , काँग्रेस में दावेदारों के टोटे पड़े तो भाजपा में आई दावेदारों की बाढ़ लेकिन अंदर की बात कुछ और है ,पढिये पूरी खबर…

प्रदेश के सबसे अहम नगरी निकाय क्षेत्र कुनकुरी में जहाँ भाजपाई दावेदारों में अध्यक्ष पद के लिए होड़ मची हुई है वहीं कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए महज 2 दावेदारों के ही आवेदन आये हैं। काँग्रेस के इन दो दावेदारों में से एक दावेदार मुरारी गुप्ता हैं जबकि कांग्रेस दूसरे दावेदार का नाम डिस्क्लोज नहीं करना चाहती इसलिए दूसरे दावेदार का नाम अभी तक सामने नहीं आया है ।
मुरारी गुप्ता 2014 में काँग्रेस पार्टी के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले सशक्त दावेदार थे लेकिन ऐन वक्त पर किन्हीं कारणों से उनका नामांकन रद्द हो गया था। 10 वर्षों बाद जब फिर से कुनकुरी सीट ओबीसी के पाल्हे में आया तो इस बार उन्होंने फिर से किस्मत आजमाने का फैसला किया है। सवाल यह है कि दूसरा दावेदार कौन है जिसका नाम काँग्रेस लेने से फिलहाल बच रही है ? कहा जा रहा है कि काँग्रेस दूसरे दावेदार के नाम का पत्ता इसलिए नहीं खोलना चाहती क्योंकि भाजपा ने अभी तक अपने दावेदारों को लेकर भी कोई पत्ता नहीं खोला है।
भाजपा की ओर से अभी तक अध्यक्ष पद के लिए 3 दावेदारों के नाम सामने आए हैं जिनमे एक नाम नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष सुदबल राम यादव का भी है जबकि दूसरा नाम भाजपा पार्षद राजेश ताम्रकार और तीसरा नाम भाजपा पार्षद राजेन्द्र गुप्ता का है। भाजपा के सूत्र बताते हैं कि इन्हीं तीन नामो में से एक नाम पर मूहर लगनी है और भाजपा जबतक अपना प्रत्याशी क्लीयर नहीं करती तबतक काँग्रेस भी अपना पत्ता नहीं खोलने वाली। काँग्रेस दूसरे दावेदार पर ही दांव खेलना चाहती है इसलिए उसका नाम उजागर नहीं कर रही है ।काँग्रेस पार्टी के करीबी सूत्रों का कहना है कि काँग्रेस इस सीट को किसी भी हाल में हासिल करना चाहती है इसलिए काँग्रेस फिलहाल अपनी रणनीतियों को गोपनीय रख रही है।
दरअसल काँग्रेस चुनावी अंक गणित में इस सीट को काफी सेफ मान रही है। काँग्रेस इस बात से पूरी तरह कॉन्फिडेंट है कि इस बार काँग्रेस के परम्परागत वोटर्स एक भी इधर से उधर नहीं होने वाले। विवादित बयानों को लेकर गैर हिन्दू समुदायों के मतदाता इस बार एकजुट है। इनकी एकजुटता अगर बरकरार रही तो रिजल्ट भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। लेकिन भाजपाई खेमा भी खुद को काँग्रेस से बहुत आगे मांन रहा है। भाजपाई सूत्रों का कहना है कि इस चुनाव में काँग्रेस कहीं नही है। काँग्रेस के पास चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के टोटे पड़े हुए हैं। कांग्रेसी हार के डर से चुनाव लड़ना नहीं चाहते इसलिये अभी तक काँग्रेस के पास अध्यक्ष पद के 2 ही दावेदार सामने आ पाए है।
काँग्रेस और भाजपा से परे होकर राजनीतिक चिंतन करने वाले राजनीति के जानकारों का कहना है कि सत्ता से बेदखल होने के बाद और कुनकुरी सीएम का विधानसभा होने के कारण काँग्रेस के दावेदारों में इस बार भारी कमी आयी है यह सच है लेकिन काँग्रेस इतनी आसानी से यहाँ हार मानने वाली नहीं है। जातीय समीकरण और काँग्रेस के परम्परागत वोटों के आंकड़ों पर गौर करें तो भाजपा काँग्रेस से ज्यादा आगे नहीं है। यह सीट 2008 से अबतक अधिकांशतः काँग्रेस के हिस्से में रही है। भाजपा 16 वर्षों में केवल एक बार ही 2014 में यहाँ किला फतेह कर पाई है । 2014 के निकाय चुनाव में सुदबल राम यादव पहली बार भाजपा से अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे तब काँग्रेस में प्रत्याशी को लेकर भारी फुट हुई थी और काँग्रेस के एक मजबूत खेमे ने काँग्रेस के प्रत्याशी का प्रचार करने के बजाय अंदरूनी तौर पर भाजपा का समर्थन कर दिया था इस वजह से यहाँ सुदबल राम यादव की ऐतिहासिक जीत हुयी थी इसके बाद 2019 में फिर से यहाँ काँग्रेस की सरकार बन गयी।
ऐसे में यह सीट जीतना काँग्रेस के लिए जितना मुश्किल है उतना ही मुश्किल भाजपा के लिए भी है इसलिए भाजपा भी अपने प्रत्याशियों को लेकर काफी सीरियस है और जीताऊ कंडीडेट को ही टिकट देना चाहती है वही काँग्रेस का फोकस इस बार अध्यक्ष की सीट पर ज्यादा है इसलिए काँग्रेस भी काफी फूंक फूंक कर कदम रख रही है ।देखना यह होगा कि दांव किसका भारी पड़ता है ?



