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ABVP से शुरू हुआ सफर, इस्तीफे पर खत्म हुई मंत्री की पारी? जानिए धर्मेंद्र प्रधान की पूरी कहानी

Dharmendra Pradhan Resignation: धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी चर्चाओं में शामिल हो गया है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है, जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्र आंदोलन लगातार चर्चा में था। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था बल्कि केंद्र की राजनीति को भी सुर्खियों में ला दिया।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उस समय सामने आया, जब जंतर-मंतर पर CJP और कई छात्र संगठनों के नेतृत्व में लगातार प्रदर्शन चल रहा था। आंदोलनकारियों का आरोप था कि प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई कथित अनियमितताओं ने लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित किया है।आंदोलन की प्रमुख मांगों में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, प्रदर्शनकारी छात्रों पर दर्ज मामलों को वापस लेना और प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता देना शामिल था। इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की लंबी भूख हड़ताल भी चर्चा का विषय बनी रही। लगातार बढ़ते दबाव के बीच यह मामला राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया।

ओडिशा की धरती से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जितना चर्चा में है, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प उनका राजनीतिक सफर रहा है। उनका जन्म 26 जून 1969 को ओडिशा के तालचर में हुआ। वे पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. देबेंद्र प्रधान के पुत्र हैं, इसलिए बचपन से ही राजनीतिक माहौल उनके जीवन का हिस्सा रहा।उन्होंने उत्कल विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान (Anthropology) में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। छात्र जीवन में ही उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़कर संगठनात्मक राजनीति की शुरुआत की। युवाओं के बीच उनकी सक्रियता और संगठन क्षमता ने उन्हें जल्द ही भाजपा के उभरते नेताओं की सूची में शामिल कर दिया।

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संगठन के मजबूत नेता के रूप में बनाई पहचान
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भले ही आज चर्चा में हो, लेकिन भाजपा संगठन में उनकी पहचान एक कुशल रणनीतिकार की रही है। वे वर्षों तक युवा मोर्चा और संगठन से जुड़े अलग-अलग दायित्व निभाते रहे।ओडिशा जैसे राज्य में भाजपा के विस्तार में उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है। संगठन को मजबूत करने, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और चुनावी रणनीति तैयार करने में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इसी कारण पार्टी नेतृत्व ने उन्हें लगातार बड़ी जिम्मेदारियां सौंपीं।

विधायक से सांसद और फिर केंद्रीय मंत्री तक
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा समझने के लिए उनका संसदीय सफर भी अहम है। वर्ष 2000 में वे पहली बार ओडिशा की पल्ललहारा विधानसभा सीट से विधायक बने। इसके बाद 2004 में देवगढ़ लोकसभा सीट से सांसद चुने गए।बाद में उन्होंने बिहार और मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्यसभा सदस्य के रूप में भी संसद में अपनी भूमिका निभाई। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने ओडिशा की संबलपुर सीट से जीत दर्ज की और लोकसभा पहुंचे।

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मोदी सरकार के भरोसेमंद मंत्री रहे
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद मंत्रियों में गिने जाते रहे हैं।वर्ष 2014 में उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। इसी दौरान प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को देशभर में लागू करने में उनकी अहम भूमिका रही। करोड़ों गरीब परिवारों तक एलपीजी कनेक्शन पहुंचाने वाली यह योजना केंद्र सरकार की सबसे चर्चित योजनाओं में शामिल रही।इसके अलावा उन्होंने इस्पात मंत्रालय का कार्यभार भी संभाला। औद्योगिक विकास और पूर्वी भारत में निवेश बढ़ाने से जुड़े कई प्रयास उनके कार्यकाल में सामने आए।

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कौशल विकास और शिक्षा सुधार पर रहा फोकस
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आने से पहले वे शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। इससे पहले उन्होंने कौशल विकास मंत्रालय में आईटीआई नेटवर्क के विस्तार, युवाओं को रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण देने और नए स्किल कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर काम किया।शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के क्रियान्वयन, उच्च शिक्षा में सुधार, डिजिटल शिक्षा और नई शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई कार्यक्रमों की निगरानी की।

इस्तीफे के बाद क्या बदलेगा?
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सामने आने के बाद अब राजनीतिक और शैक्षणिक दोनों क्षेत्रों में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक तरफ छात्र संगठन इसे अपनी बड़ी जीत बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा के सामने शिक्षा मंत्रालय के नए नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान का करियर भाजपा के संगठन, संसद और केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों से जुड़ा रहा है। ऐसे में उनका इस्तीफा केवल एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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