Reg No. CG-06-0026209
IMG-20250604-WA0015-1
IMG-20250604-WA0014-1
WhatsApp Image 2026-06-25 at 17.56.31 (1)
WhatsApp Image 2026-06-25 at 17.55.51 (1)
b5ce874a-8a3f-482a-9d4a-eaf6ab18dc7e
छत्तीसगढ़जांजगीर-चाम्पादेश- विदेशराज्य एवं शहररायपुर

Raigarh Coal Mining: रायगढ़ की छाती पर चलेंगे आरे: ‘काले सोने’ की भूख में बिछेगी 56 हजार पेड़ों की लाशें, कॉरपोरेट मुनाफे के लिए उजड़ेगा हाथियों का आशियाना!

रायगढ़ : विकास की अंधी दौड़ और ‘काले सोने’ की अतृप्त भूख ने एक बार फिर प्रकृति के सीने पर गहरा घाव देने की पूरी तैयारी कर ली है। छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता और घने जंगलों के लिए जाना जाता है, अब औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं की बलिबेदी पर चढ़ने जा रहा है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अधिकार प्राप्त समिति ने कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे को सर्वोपरि रखते हुए रायगढ़ की दो विशाल कोयला खनन परियोजनाओं के लिए 983.44 हेक्टेयर बेशकीमती वन भूमि के डायवर्जन को अपनी सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। वातानुकूलित कमरों में फाइलों पर किए गए इन हस्ताक्षरों ने दरअसल रायगढ़ की माटी पर लहलहाते 56 हजार से अधिक जीवनदायी पेड़ों का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया है। यह फैसला केवल पेड़ों की कटाई का नहीं है, बल्कि यह सदियों से पनप रहे एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के समूल विनाश और वन्यजीवों के जबरन विस्थापन की एक खौफनाक पटकथा है।

पुरुंगा के जंगलों में गूंजेगी मशीनों की चीख और उजड़ेंगे आशियाने

केंद्र सरकार की वन सलाहकार समिति ने जिन परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई है, उनमें रायगढ़ के छाल तहसील में स्थित ‘पुरुंगा अंडरग्राउंड कोल ब्लॉक’ प्रमुख है। समिति ने राज्य सरकार के प्रस्ताव को स्वीकृति देते हुए 621.331 हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग को अपनी प्रारंभिक सहमति सौंप दी है। यह तथ्य बेहद गंभीर है कि इस ब्लॉक का सीधा आवंटन अडानी समूह के मालिकाना हक वाली ‘अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड’ के पक्ष में किया गया है।

See also  उपराष्ट्रपति धनखड़ का रायपुर पहुंचने पर आत्मीय स्वागत, उपराष्ट्रपति के करकमलों से राज्य अलंकरण से विभूषित होंगी विभूतियां...

धरती का सीना चीरकर कोयला निकालने की इस कवायद में 4,368 विशालकाय और पुराने पेड़ों को कुल्हाड़ियों और मशीनों से जमींदोज कर दिया जाएगा। विडंबना यह है कि सरकारी महकमे अपनी ही रिपोर्टों में इस सत्य को स्वीकार कर चुके हैं कि यह समूचा इलाका एशियाई हाथियों, स्लॉथ भालू, चीता, भारतीय पैंगोलिन और लोमड़ियों जैसे दुर्लभ और संरक्षित वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है। इन बेजुबानों के उजड़ते घरों की भरपाई के लिए समिति ने 14.81 करोड़ रुपये की एक वन्यजीव प्रबंधन योजना का कागजी पुलिंदा जरूर थमा दिया है, लेकिन प्रकृति के बनाए जंगलों का विकल्प कभी भी चंद सिक्कों और कंक्रीट की योजनाओं से नहीं गढ़ा जा सकता।

पेलमा में बिछेगी 52 हजार पेड़ों की लाशें, चरम पर होगा मानव-हाथी संघर्ष

Advertisment

विनाश का यह तांडव केवल पुरुंगा की सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। इसी कड़ी में समिति ने रायगढ़ की महात्वाकांक्षी ‘पेलमा ओपन कास्ट कोयला खदान परियोजना’ को भी अपनी स्टेज-1 की क्लीयरेंस दे दी है। इस परियोजना का दायरा इतना विकराल है कि इसका कुल खनन पट्टा क्षेत्र 2,077.935 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जिसमें 362.109 हेक्टेयर सघन वन क्षेत्र सीधे तौर पर खदान के मुंह में समा जाएगा।

See also  ओपी चौधरी ने केंद्रीय मंत्री डॉ मनसुख मांडविया को जन्मदिन की दी बधाई

पेलमा में ओपन कास्ट यानी खुली खदान तकनीक से कोयला निकालने के लिए 52,570 पेड़ों के कत्लेआम का जो खौफनाक प्रस्ताव पारित किया गया है, वह भविष्य की एक बड़ी त्रासदी का संकेत है। वन विभाग के अपने दस्तावेज इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यह क्षेत्र हाथियों का पारंपरिक और बेहद सक्रिय मार्ग है। भले ही सरकारी फाइलों के पन्नों पर इसे ‘आधिकारिक एलीफेंट कॉरिडोर’ का दर्जा न मिला हो, लेकिन 52 हजार से ज्यादा पेड़ों के सफाए का सीधा सा अर्थ है हाथियों के सदियों पुराने घर को उजाड़ देना।

जब इन विशालकाय जीवों का रहवास और भोजन छिनेगा, तो वे अपनी जान बचाने के लिए रिहायशी इलाकों का रुख करेंगे। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि आने वाले समय में रायगढ़ जिले में ‘मानव-हाथी द्वंद्व’ एक भयावह और खूनी रूप ले लेगा, जिसकी कीमत अंततः आम ग्रामीणों और बेजुबान जानवरों को अपनी जान देकर चुकानी होगी। पेलमा खदान का आवंटन भले ही कागजों पर सरकारी कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) के नाम पर है, लेकिन इसके संचालन, विकास और उत्खनन का असल नियंत्रण अडानी समूह की ही कंपनी के हाथों में है।

कानूनी भूलभुलैया और हसदेव अरण्य का खौफनाक साया

वन संरक्षण अधिनियम के तहत जंगलों की बलि चढ़ाने की यह कानूनी प्रक्रिया तीन चरणों के चक्रव्यूह से होकर गुजरती है। वर्तमान में मिली यह ‘स्टेज-1’ क्लीयरेंस भले ही सैद्धांतिक हो, लेकिन यह इस बात की पुख्ता और निर्मम मुनादी है कि सत्ता ने जंगल उजाड़ने का अटल मन बना लिया है। निर्धारित औपचारिकताएं पूरी होते ही स्टेज-2 की अंतिम मुहर लगेगी और राज्य सरकार के आदेश के साथ ही जंगलों में आरा मशीनें गरजने लगेंगी।

See also  पामगढ़ के गौठान में हरेली पर्व धूमधाम से मनाया गया एवं छत्तीसगढ़िया ओलंपिक का हुआ आगाज...

रायगढ़ के जंगलों पर मंडराता यह काला साया कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधनों को कॉरपोरेट घरानों की जागीर बनाने की उस क्रूर श्रृंखला का एक और अध्याय है, जिसकी शुरुआत हसदेव अरण्य से हो चुकी है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि बीते जून में ही केंद्र सरकार ने हसदेव के समृद्ध जंगलों में स्थित ‘केते एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोयला ब्लॉक’ को पर्यावरणीय मंजूरी थमाई है, जहां 1,742.6 हेक्टेयर जंगल और लगभग 4.48 लाख पेड़ों के सफाए का क्रूर फैसला लिया जा चुका है।

आज हसदेव से लेकर रायगढ़ तक, छत्तीसगढ़ की धरती अपने ही प्राकृतिक संसाधनों के निर्मम दोहन और वन-आश्रित मूलनिवासी समुदायों के विस्थापन की मूक गवाह बन रही है। पर्यावरणविदों, स्थानीय ग्रामीणों और प्रकृति प्रेमियों के लिए यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक गहरा आघात है, जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि विकास की इस अंधी दौड़ का अंतिम पड़ाव क्या केवल एक उजड़ी हुई, वीरान और काली धरती होगी।

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!