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दुनिया में बजेगा भारत के सरकारी बैंकों का डंका, सरकार ने बनाया ‘मेगा मर्जर प्लान’

देश के सरकारी बैंकों को मजबूत करने और दुनिया के टॉप 100 सबसे पॉवरफुल बैंकों में शुमार करने के लिए सरकार एक बड़े रिफॉर्म की तैयारी कर रहा है. ये रिफॉर्म एक बड़े मर्जर के तौर पर देखा जा रहा है. इसके लिए सरकार की ओर से ‘मेगा मर्जर प्लान’ की तैयारी की जा रही है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सरकार देश के 12 सरकारी बैंकों को मर्ज करने की प्लानिंग कर रही है. जिनसे तीन बड़े बैंकों को तैयार किया जाएगा. इसका मतलब है कि औसतन चार बैंकों को मर्ज कर एक बैंक खड़ा किया जाएगा. मनीकंट्रोल की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी सूत्रों के हवाले से, विचाराधीन प्रस्ताव में कुछ छोटे बैंकों, जैसे आईओबी, सीबीआई और बीओआई का पीएनबी, बीओबी और एसबीआई जैसे बड़े बैंकों के साथ मर्जर हो सकता है.

कौन से बैंकों का हो सकता है विलय?
रिपोर्ट के अनुसार, संभावित मर्जर (छोटे बैंक) इंडियन ओवरसीज बैंक (आईओबी), सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (सीबीआई), बैंक ऑफ इंडिया (बीओआई) और बैंक ऑफ महाराष्ट्र (बीओएम) हैं. इसके अलावा, संभावित विलय वाली संस्थाएं (बड़े बैंक) भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) और बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) हैं. सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है. रिपोर्टों के अनुसार, इन प्रस्तावों पर वर्तमान में आंतरिक रूप से चर्चा की जा रही है.

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डेडलाइन पर हो रहा विचार?
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 तक चर्चा जारी रहने की उम्मीद है, और सरकार इसी वित्त वर्ष में एक रोडमैप को अंतिम रूप देना चाहती है. किसी भी औपचारिक घोषणा से पहले प्रस्ताव पर आंतरिक विचार-विमर्श किया जाएगा.

क्यों किया जा रहा है बैंकों का मर्जर?
सरकार का लक्ष्य कम, अधिक मजबूत और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी सरकारी बैंक बनाना है जो भारत के आर्थिक विस्तार के अगले चरण का समर्थन कर सकें. इस कदम से बड़े पैमाने पर लोन ग्रोथ को समर्थन देने के लिए बैलेंस शीट मज़बूत होगी, परिचालन दक्षता में सुधार होगा, प्रशासनिक दोहराव कम होगा, प्राइवेट बैंकों और फिनटेक कंपनियों के मुकाबले प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी, और ऐसे बैंक बनेंगे जो उच्च-टिकट वाले बुनियादी ढाँचे और विनिर्माण लोन को संभाल सकें.

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नीति आयोग ने पहले सुझाव दिया था कि एसबीआई, पीएनबी, बैंक ऑफ बड़ौदा और केनरा बैंक सहित केवल कुछ बड़े सरकारी बैंकों को ही पूर्ण सरकारी नियंत्रण में रहना चाहिए, जबकि आईओबी और सीबीआई जैसे छोटे लेंडर्स के निजीकरण, पुनर्गठन या विलय पर विचार किया जा सकता है.

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मनीकंट्रोल की रिपोर्ट में कहा गया है कि “मौजूदा योजना उन्हीं सिफारिशों पर आधारित है, लेकिन उन्हें वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार ढाला गया है”. फिनटेक कंपनियों के तेज़ी से विस्तार और निजी बैंकों की बाज़ार हिस्सेदारी बढ़ने के साथ, केंद्र सरकारी बैंकों को “छितराने के बजाय रणनीतिक रूप से स्थापित” करने पर विचार कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना पर कैबिनेट स्तर पर “चर्चा का एक रिकॉर्ड” बनाया जाएगा और फिर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा इसकी जांच की जाएगी.

‘चर्चा का रिकॉर्ड’ क्या है?
यह एक आंतरिक सरकारी दस्तावेज़ है जो प्रमुख विचार-विमर्शों को दर्ज करता है और भविष्य के निर्णयों का आधार बनता है. किसी प्रस्ताव के कैबिनेट या प्रधानमंत्री कार्यालय में जाने से पहले, चर्चा का रिकॉर्ड यह सुनिश्चित करता है कि सभी प्रारंभिक बिंदुओं, असहमतियों और विकल्पों का दस्तावेजीकरण हो जाए.

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अब तक कितने बैंकों का हो चुका है विलय
2017 और 2020 के बीच, सरकार ने मर्जर का एक बड़ा दौर चलाया था, जिससे सरकारी बैंकों की संख्या को 27 से घटकर 12 कर दी गई. इस अवधि के दौरान हुए प्रमुख विलयों में ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (OBC) और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का PNB में विलय किया गया. सिंडिकेट बैंक का केनरा बैंक में विलय किया गया. आंध्र बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक का यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (UBI) में विलय किया गया. इलाहाबाद बैंक का इंडियन बैंक में विलय किया गया. इनका उद्देश्य असेट्स क्वालिटी में सुधार, शासन को मजबूत करना और पैमाने की दक्षता लाना था.

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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