छत्तीसगढ़: 26 साल बाद हाईकोर्ट का फैसला, शराब माफिया हमले में सजा कम

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित पुलिस हमले के मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने 26 साल बाद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपियों की सजा में कमी जरूर की है, लेकिन उनके दोषी होने के तथ्य को बरकरार रखा है। इस फैसले को कानून और न्याय की दृष्टि से अहम माना जा रहा है।
2000 में पुलिस पर हुआ था जानलेवा हमला
यह घटना 13 अगस्त 2000 की है, जब जीआरपी चौकी चरौदा (दुर्ग) को रेलवे स्टेशन के पास अवैध शराब बिक्री की सूचना मिली थी। मौके पर पहुंचे आरक्षक योगेंद्र सिंह और परमानंद भोई ने कुछ लोगों को शराब के कार्टन उतारते देखा। पुलिस को देखते ही आरोपी भाग निकले, लेकिन थोड़ी देर बाद अपने साथियों के साथ लौटकर उन्होंने पुलिस पर हमला कर दिया।
चाकू, डंडों से किया गया हमला
हमलावरों ने पुलिसकर्मियों पर चाकू, लाठी और डंडों से ताबड़तोड़ वार किए। आरक्षक योगेंद्र सिंह को पेट, पसलियों और सिर पर गंभीर चोटें आईं, जबकि परमानंद भोई के पेट में चाकू मारा गया। हमले के बाद आरोपी शराब के कार्टन लेकर फरार हो गए। घायल पुलिसकर्मियों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 7 साल की सजा
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 395 (डकैती), धारा 148 और 324 समेत अन्य धाराओं में दोषी मानते हुए 7 साल तक की सजा और जुर्माना लगाया था।
हाईकोर्ट ने सजा घटाकर 4 साल की
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद माना कि आरोपियों ने सामूहिक रूप से पुलिस पर हमला किया और जब्त शराब को छीनने की मंशा थी, जो डकैती की श्रेणी में आता है। हालांकि, घटना को 26 साल बीत जाने और आरोपियों की वर्तमान उम्र को देखते हुए कोर्ट ने सजा 7 साल से घटाकर 4 साल कर दी।
डकैती की परिभाषा पर कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पांच या उससे अधिक लोग मिलकर अपराध करते हैं, तो भले ही कुछ आरोपी फरार हों, फिर भी इसे डकैती (धारा 395) माना जाएगा। हालांकि कोर्ट ने धारा 397 (खतरनाक हथियार से डकैती) से आरोपियों को बरी कर दिया।



