Reg No. CG-06-0026209
IMG-20250604-WA0015-1
IMG-20250604-WA0014-1
WhatsApp Image 2026-06-25 at 17.56.31 (1)
WhatsApp Image 2026-06-25 at 17.55.51 (1)
b5ce874a-8a3f-482a-9d4a-eaf6ab18dc7e
छत्तीसगढ़जांजगीर-चाम्पा

अद्भुत आस्था का संगम पुरी रथयात्रा आज…

जगन्नाथपुरी। पूर्व भारतीय उड़ीसा राज्य का पुरी जिसे पुरूषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र, श्री क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है जो भगवान श्री जगन्नाथजी की मुख्य लीलाभूमि है। यहां स्थित भगवान जगन्नाथ का धाम हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। उड़ीसा प्रांत के जगन्नाथपुरी में सैकड़ों वर्षों से निकलने वाली जगन्नाथ रथयात्रा का आयोजन कल होगा , यह पुरी का प्रधान पर्व है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये श्रीसुदर्शन संस्थानम् पुरी शंकराचार्य आश्रम/मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी ने बताया कि जगन्नाथ रथ यात्रा का हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व होता है , इस रथयात्रा का आयोजन उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से होता है। इस रथयात्रा को गुण्डीचा यात्रा , पतितपावन यात्रा , जनकपुरी यात्रा नवदिवसीय यात्रा तथा दशावतार यात्रा के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है , जो दशमी तिथि तक चलती है। इस रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ भी निकाला जाता है। इस रथ यात्रा को लेकर मान्यता है कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी। तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन की इच्छा पूर्ति के लिये उन्हें रथ में बिठाकर पूरे नगर का भ्रमण करवाया था और इसके बाद से इस रथयात्रा की शुरुआत हुई थी। जगन्नाथजी की रथ यात्रा के बारे में स्कंद पुराण , नारद पुराण , पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी बताया गया है। इसलिये हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो भी व्यक्ति इस रथयात्रा में शामिल होकर इस रथ को खींचता है उसे सौ यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। स्कन्द पुराण में वर्णित है कि जो व्यक्ति रथ यात्रा में शामिल होकर जगत के स्वामी जगन्नाथजी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा नगर तक जाता है वह सारे कष्टों से मुक्त हो जाता है, जबकि जो व्यक्ति जगन्नाथ को प्रणाम करते हुये मार्ग के धूल-कीचड़ आदि में लोट-लोट कर जाता है वो सीधे भगवान विष्णु के उत्तम धाम को प्राप्त होता है और जो व्यक्ति गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान श्री कृष्ण , बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा को आते हुये करता है उसे मोक्ष मिलता है।

See also  जल जीवन मिशन के कार्यों में संतोषजनक प्रगति नहीं होने, दायित्वों एवं कर्तव्यों के निर्वहन में उदासीनता पर हटाए पर गए ईई, प्रमुख अभियंता द्वारा जारी आदेश तत्काल प्रभाव से लागू...

तीनों रथों की है अलग अलग महत्ता

सैकड़ों साल पुराने इस मंदिर में भगवान कृष्ण को जगत के नाथ जगन्नाथजी के रूप में पूजा जाता है और इनके साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी विराजमान हैं। रथयात्रा में तीनों ही देवों के रथ निकलते हैं। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के साथ भाई बलराम और बहन सुभद्रा के लिये अलग-अलग रथ होते हैं और इन रथों को बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया से होती है। रथयात्रा में सबसे आगे तालध्वज रथ पर श्रीबलराम , बीच में पद्मध्वज रथ पर बहन सुभद्रा और सबसे पीछे नंदीघोष रथ पर भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। सभी के रथ अलग-अलग रंग और ऊंचाई के होते हैं। भगवान बलरामजी के रथ को ‘तालध्वज’ कहा जाता है और इसकी पहचान लाल और हरे रंग से होती है। वहीं सुभद्रा के रथ का नाम ‘दर्पदलन’ अथवा ‘पद्म रथ’ है,उनके रथ का रंग काला या नीले रंग को होता है, जिसमें लाल रंग भी होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष अथवा गरुड़ध्वज कहा जाता है, इनका रथ लाल और पीले रंग का होता है। रथ हमेशा नीम की लकड़ी से बनाया जाता है, क्योंकि ये औषधीय लकड़ी होने के साथ पवित्र भी मानी जाती है। हर साल बनने वाले ये रथ एक समान ऊंचाई के ही बनाये जाते हैं। इसमें भगवान जगन्नाथ का रथ 45.6 फीट ऊंचा , बलराम का रथ 45 फीट और देवी सुभद्रा का रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है। भगवान के रथ में एक भी कील या कांटे आदि का प्रयोग नहीं होता। यहां तक की कोई धातु भी रथ में नहीं लगायी जाती है। रथ की लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के दिन और रथ बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन से होती है।

See also  IND vs UAE, Asia Cup 2025: टीम इंडिया के लिए बड़ा खतरा है ‘लालू’, खुद को खड़ूस बताकर ली बड़ी सौगंध

छर पहनरा की है परम्परा

तीनों रथ के तैयार होने के बाद इसकी पूजा के लिये पुरी के गजपति राजा की पालकी आती है। इस पूजा अनुष्ठान को ‘छर पहनरा’ नाम से जाना जाता है। इन तीनों रथों की वे विधिवत पूजा करते हैं और ‘सोने की झाड़ू’ से रथ मण्डप और यात्रा वाले रास्ते को साफ किया जाता है।

Advertisment

गुण्डीचा मंदिर होता है विश्राम स्थल

आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को रथयात्रा ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के साथ रथ को लोग खींचते हैं। जिसे रथ खींचने का सौभाग्य मिल जाता है, वह महाभाग्यशाली माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर से रथ यात्रा शुरू होकर तीन कि.मी. दूर गुंडीचा मंदिर पहुँचती है। इस स्थान को भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यहीं पर विश्वकर्मा ने इन तीनों प्रतिमाओं का निर्माण किया था अतः यह स्थान जगन्नाथ जी की जन्म स्थली भी है। यहां तीनों देव सात दिनों के लिये विश्राम करते हैं। आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुनः मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। वापसी की यह यात्रा बहुड़ा यात्रा कहलाती है। जगन्नाथ मंदिर पहुँचने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच देव-विग्रहों को पुनः प्रतिष्ठित किया जाता है।

See also  अंजनेया यूनिवर्सिटी व कोर्स स्क्वायर के संयुक्त प्रयास से जांजगीर में सफल करियर काउंसलिंग, 50+ विद्यार्थी हुए शामिल

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!