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खोखरा में भोजली की अनोखी परंपरा, शीतला माता मंदिर में गूंजे लोकगीत, भोजली के रंग में रंगा खोखरा, शीतला माता मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब

जांजगीर-चांपा। जांजगीर-चांपा जिले से लगे ग्राम खोखरा स्थित प्रसिद्ध शीतला माता मंदिर में भोजली त्यौहार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। हरियाली, अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और अटूट मित्रता का प्रतीक यह लोकपर्व छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति का अहम हिस्सा है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में महिलाएं और ग्रामीण शामिल हुए और भोजली दाई की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की। भोजली पर्व की परंपरा और महत्व को लेकर हमारे संवाददाता राजेश्वर तिवारी ने महिलाओं से खास बातचीत की।
हरे-भरे भोजली के अंकुर… लोकगीतों की गूंज… और आस्था के साथ मनाया जा रहा छत्तीसगढ़ का पारंपरिक लोकपर्व भोजली
जांजगीर-चांपा जिले से लगे ग्राम खोखरा के शीतला माता मंदिर में भोजली त्यौहार को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। महिलाओं ने विधि-विधान से भोजली की पूजा-अर्चना की और अच्छी फसल एवं परिवार की खुशहाली की कामना की।
मान्यता है कि टोकरी में बोए गए गेहूं या जौ के हरे-भरे अंकुर आने वाली फसल की समृद्धि का संकेत होते हैं। भोजली को भोजली दाई या देवी का स्वरूप मानकर श्रद्धा के साथ पूजा जाता है।
भोजली पर्व का एक खास पहलू है मितानी का रिश्ता। भोजली विसर्जन के बाद लोग एक-दूसरे के कान में भोजली खोंचकर मितानी या गींया का रिश्ता बनाते हैं। इस रिश्ते को जीवनभर निभाने वाला और बेहद पवित्र माना जाता है।
भोजली के गीतों और सामूहिक आयोजन के जरिए ग्रामीणों के बीच प्रेम, भाईचारा और सामाजिक एकजुटता का संदेश भी मिलता है। यही वजह है कि आधुनिक दौर में भी छत्तीसगढ़ की यह पारंपरिक संस्कृति और लोकपर्व पूरी श्रद्धा के साथ जीवंत है।
ग्राम खोखरा के शीतला माता मंदिर में मनाया गया भोजली त्यौहार न सिर्फ आस्था और कृषि समृद्धि का संदेश देता है, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा और आपसी भाईचारे को भी मजबूत करता है।



