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गरीबी: स्थिति या मानसिक सोच?

अतुल मलिकराम (लेखक और राजनीतिक रणनीतिकार)

गरीबी, हमारे देश में एक ऐसी समस्या है, जिसे खत्म करने के लिए सबसे ज्यादा प्रयास किए गए। इसके लिए हर प्रकार की योजनाएँ, कार्यक्रम और अभियान चलाए गए, फिर भी इस समस्या से छुटकारा नहीं पाया जा सका। इसका एक कारण यह है कि इस समस्या को केवल एक आर्थिक स्थिति मानकर ही इसका हल खोजा जाता रहा, जबकि यह समस्या केवल आर्थिक अभाव की स्थिति नहीं है, बल्कि इससे बढ़कर यह एक मानसिक स्थिति भी है। जब इस समस्या की जड़ आर्थिकता से कहीं अधिक है, तो केवल ऊपरी समाधान करने से इस समस्या को हल कैसे किया जा सकता है? यही कारण है कि सरकार आज तक गरीबी से निकलने का कोई सार्थक तरीका खोज नहीं पाई है।

यह एक ऐसा जटिल विषय है, जो हमारे समाज में गहराई तक जड़ें जमाए हुए है। गरीब होना केवल पैसों की कमी का नाम नहीं है, बल्कि यह उस सोच का भी परिणाम है, जो किसी को गरीबी के जाल से बाहर निकलने से रोकती है। कई बार लोग गरीबी को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से देखते हैं। उनके अनुसार, गरीबी मिटाने का समाधान केवल धन है। लेकिन, क्या सचमुच ऐसा है? यदि केवल आर्थिक मदद से गरीबी दूर हो सकती, तो अब तक दुनिया से गरीबी का नामो-निशान मिट चुका होता। लेकिन ऐसा नहीं है।
आर्थिक स्थिति के साथ-साथ गरीबी उस मानसिकता का परिणाम है, जिसमें इंसान अपने आप को परिस्थितियों का गुलाम मान लेता है। ऐसी सोच वाले लोग अपनी स्थिति को बदलने का प्रयास ही नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि उनका जीवन हमेशा ऐसा ही रहेगा। इस सोच के कारण वे अपनी संभावनाओं को तलाशने और खुद को बेहतर बनाने की कोशिश तक करने की पहल नहीं करते।

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आपने कई बार देखा और सुना होगा कि कुछ परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीब रहते हैं। इसका कारण केवल आर्थिक संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि वह मानसिकता है, जो उनकी हर पीढ़ी को विरासत में मिलती है। बच्चे अपने परिवार के वातावरण और सोच को आत्मसात कर लेते हैं। जब वे अपने माता-पिता को यह कहते सुनते हैं, “हम तो हमेशा से गरीब हैं”, या “गरीबी के साए में पलना-बढ़ना ही हमारी किस्मत में है”, तो उनके मन ही नहीं, बल्कि जीवन में भी यही विश्वास घर कर जाता है। और यही विश्वास फिर धीरे-धीरे उनकी सोच और व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। इस प्रकार, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह मानसिकता हस्तांतरित होती रहती है और गरीबी नाम का यह साया और भी काला होता चला जाता है।

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गरीबी की कैद से बाहर निकलने के लिए केवल धन की आवश्यकता नहीं होती। इसकी असली चाबी है सकारात्मक सोच और दृढ़ संकल्प। वे ही लोग गरीबी से बाहर निकल सके हैं, जिन्होंने सबसे पहले अपनी सोच और मानसिकता बदली। उन्होंने यह समझा कि गरीब होना स्थायी स्थिति नहीं है। वे समझते हैं कि यदि वे मेहनत करें, अपने हुनर को पहचाने और अवसरों का लाभ उठाएं, तो वे अपनी स्थिति को बदल सकते हैं।

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सोच के समृद्ध होने का मतलब केवल बड़े सपने देखना नहीं है। इसका मतलब है हर चुनौती को अवसर के रूप में देखना और लगातार प्रयास करते रहना, और यह ठान लेना कि इस स्थिति से बाहर निकलना ही है। जब तक यह विश्वास नहीं होगा कि आप अपनी स्थिति बदल सकते हैं, तब तक कोई भी आपकी मदद नहीं कर पाएगा। इसलिए गरीबी से बाहर निकलने के लिए सबसे पहले मानसिकता बदलने की जरुरत है।

खुद पर विश्वास करना गरीबी से बाहर निकलने की पहली सीढ़ी है। जब आप यह मानेंगे कि आप बदलाव ला सकते हैं, तभी आप प्रयास करेंगे। ज्ञान और कौशल वह हथियार हैं, जिनसे आप किसी भी स्थिति से बाहर निकल सकते हैं। नई चीजें सीखें, नए कौशल विकसित करें और अपने आप को बेहतर बनाने की दिशा में काम करें। अपनी सोच को सकारात्मक बनाएं। नकारात्मक विचारों को त्यागें और हर समस्या में समाधान ढूंढने की आदत डालें।

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गरीबी केवल एक आर्थिक स्थिति नहीं है, यह एक मानसिकता है। जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलते, तब तक गरीबी का जाल तोड़ना मुश्किल है। गरीबी को केवल आर्थिक समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। हमें यह समझना होगा कि यह समस्या मानसिकता से भी जुड़ी है।

यदि हम अपनी सोच को सकारात्मक बनाएँ, अपने आप पर विश्वास रखें और अवसरों का लाभ उठाएँ, तो हम गरीबी से बाहर निकल सकते हैं। इसी के साथ, समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। हमें मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी व्यक्ति अपनी मानसिकता के कारण गरीबी के जाल में न फंसे। गरीबी से बाहर निकलना आसान नहीं है, लेकिन यह असंभव भी नहीं है। दृढ़ संकल्प, सकारात्मक सोच और समाज के सहयोग से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। गरीबी से लड़ाई केवल आर्थिक सुधार की नहीं, बल्कि मानसिकता बदलने की भी है। जब हम इस मानसिकता में थोड़ा भी बदलाव ला पाएँगे, तब ही सही मायनों में गरीबी से जीत पाना संभव हो पाएगा।

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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