”बिलासपुर पुलिस विभाग में सिफारिश की सरकार – सुशासन की नहीं अब सिफारिश सरकार

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ सरकार भले ही “सुशासन तिहार” मना रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। बिलासपुर पुलिस विभाग में तबादलों को लेकर जो खेल चल रहा है, वह सुशासन के मुंह पर तमाचा है। यहां आरक्षक खुद को मंत्री, विधायक और अफसरों का रिश्तेदार बताकर मलाईदार थानों पर वर्षों से जमे हुए है । शाहर का थाना इसका जीता-जागता उदाहरण है।
सत्ता कोई भी हो, थाना हम ही चलाएंगे!
यहां ऐसा माहौल बन गया है कि मानो कुछ आरक्षक थानों के आजीवन ठेकेदार बन चुके हों। कोई खुद को ‘साहब का साला’ बताता है, तो कोई ‘मंत्री जी का खासमखास’ तो एक
आरक्षक खुद को प्रदेश के मुख्यमंत्री के करीबी बताते हैं और दावे अब सिवील लाईन से
सिरगिट्टी थाने में जाने का जुगत लगा हुआ। थाना से बार-बार तबादला होने के बावजूद एक विशेष जोड़ी हर बार वापस लौट आती है – जैसे पुलिस विभाग नहीं, इनका पारिवारिक कारोबार हो! अब तो पुलिस विभाग में यह चर्चा का विषय बना हुआ है क्या वाकई हमारे विभाग में ? इनके अकाओ की चलती है ? यह तो सच तब साबित होगा जब आरक्षक छठवें बार आरक्षक फिर अपने पसंदीदा थाने में पहुँच जाएँगे या फिर कहीं अन्यत्र ट्रांसफ़र होगा ये देखने की बात होगी।
मंत्री जी कॉल लगाएं, थाना मिल जाए!
सूत्र बताते हैं कि एक आरक्षक जो कई बार सिरगिट्टी से ट्रांसफर होने बाजूद उसी थाने में तैनात हो जाना ये कैसे संजोग है, अब फिर सीधे गृह मंत्री के जिले से कॉल करवा कर वापसी की जुगत में होने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या अब पुलिस विभाग में नियम नहीं, रिश्ते और रसूख तय करते हैं पोस्टिंग?
कमाई का अड्डा या कानून का मंदिर?
सवाल यह है कि एक आरक्षक अपने दो दोस्तों के बिना काम क्यों नहीं कर सकता? क्या नौकरी से ज़्यादा ‘कमाई’ की चिंता सता रही है? क्या सिरगिट्टी और सिविल लाइन थाने सिर्फ़ सुविधा और वसूली के केंद्र बन चुके हैं?
अब तारबाहर से भी आया नया खुलासा
तारबाहर थाना क्षेत्र में सट्टा खाईवालों से वसूली करने और लाखों रुपए के लेनदेन की चर्चा में घिरे एक आरक्षक को हाल ही में लाइन हाजिर किया गया था। लेकिन अब वही आरक्षक खुलेआम दावा जिले कवर्धा जिले से बस एक कॉल – “एक फोन आएगा और हम दोनों दोस्त सीधे साइबर रेंज पहुंच जाएंगे!” फोन वो भी कहां से? गृह मंत्री के जिले से! सवाल ये है कि क्या लाइन हाजिर होने के बावजूद रसूख इतना है कि सजा नहीं, इनाम की तैयारी चल रही है?
“अब देखना दिलचस्प होगा कि जिले के कप्तान साहेब ऐसे ‘दांवपेंच’ आज़माने वाले पुलिसकर्मियों को फिर से उनकी मनपसंद थाने की कमान सौंपते हैं या इस बार किसी अनजाने इलाके का रास्ता दिखाया जाएगा!”



