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मोबाइल से पूरी पीढ़ी हो सकती है बर्बाद ! जानें कैसे छुड़ाएं बच्चों की लत…

नई दिल्ली : कई शहरी इलाकों में छोटे बच्चों में मोबाइल की बढ़ती आदत देखी जा रही है। डेढ़-दो साल के बच्चे भी घंटों मोबाइल में वीडियो देखने या गेम खेलने में व्यस्त रहते हैं। मोबाइल की लत अब केवल शौक नहीं, बल्कि एक गंभीर समस्या बन चुकी है जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर डाल रही है।

बच्चों का बचपन स्क्रीन के पीछे छिपता जा रहा है। जिससे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर पड़ रहा है। देश के लगभग सभी शहरी और कई ग्रामीण इलाकों में छोटे बच्चों में मोबाइल की बढ़ती आदत देखी जा रही है। डेढ़-दो साल के बच्चे भी घंटों मोबाइल में वीडियो देखने या गेम खेलने में डूबे नज़र आए हैं।

अधिक स्क्रीन टाइम का शरिरक प्रभाव
आंखों पर जोर: घंटों मोबाइल स्क्रीन देखते रहने से बच्चों की आंखों में सूखापन, थकान और धुंधली दृष्टि की शिकायते सामने आ रही है।

खराब मुद्रा: गलत तरीके से बैठकर मोबाइल चलाने से बच्चों को गर्दन, पीठ और कंधों में दर्द का सामना करना पड़ रहा है। जिसके बाद आगे जाकर यह तकलीफ सर्वाइकल स्पॉन्डलाइटिस जैसा विक्राल रूप भी ले सकता है।

नींद की कमी: रात में मोबाइल का उपयोग मेलाटोनिन हार्मोन को कम करता है, जिससे बच्चों को नींद आने में परेशानी होती है। नींद की कमी से बच्चों में सुस्ती देखने की मिलती है।

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मोटापे का खतरा: खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का भी कहना है कि मोटापा बीरामियों को जड़ है जिससे आगे जाकर बच्चों में ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलैस्ट्राल और ह्रदय से संबंधित बीमारियां पाईं जा सकती है।

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मानसिक प्रभाव भी डालता है मोबाइल का उपयोग

चिंता और अवसाद: मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों में चिंता और अवसाद के लक्षणों को बढ़ावा दे रहा है।

ध्यान की कमी: लगातार फोन पर ध्यान रहने से बच्चों की एकाग्रता और ध्यान अवधि में कमी देखने को मिलने लगी है।

चिड़चिड़ापन और आक्रामकता: मोबाइल न मिलने पर बच्चे चिड़चिड़े और आक्रामक होते जा रहे हैं। जिससे उनकी पढ़ाई और भविष्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

सामाजिक कौशल में कमी: असल जिंदगी में कम समय बिताने से बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक कौशल का विकास रुक रहा है। बच्चे अब समाज तो दूर परिवार के लोगों से भी मिलने में कतराने लगे हैं।

दिखने लगी हैं सामाजिक दूरियां
रिश्तों में खटास: मोबाइल की लत के कारण बच्चे परिवार और दोस्तों से दूर होते जा रहे हैं, जिससे भावनात्मक जुड़ाव में कमी आने लगी है। जिसके चलते रिश्तों में तनाव बढ़ता जा रहा है।

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सामाजिक अलगाव: स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से बच्चे सामाजिक गतिविधियों से कट रहे हैं, जिससे स्थानीय समुदाय में उनकी भागीदारी कम हो रही है। न तो वे किसी से मिलते हैं और न ही किसी सामाजिक गतिविधी में भाग लेते हैं । जिससे वे मानसिक तौर पर परिपक्व नहीं हो पा रेह हैं।

कुछ अन्य नकारात्मक प्रभार प्रभाव

शैक्षणिक प्रदर्शन पर असर: ध्यान और एकाग्रता में कमी का प्रभाव बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर सीधा असर डाल रहा है। ये सीधे तौर पर कहा ज् सकता है कि जिन बच्चों ध्यान फोन पर ज्यादा होता है उनकी शैक्षणिक योग्यता में धीरे-धीरे कमी आने लगती है।

भाषा विकास में देरी: छोटे बच्चों में मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से भाषा और संचार कौशल का विकास धीमा पड़ सकता है। छोटे बच्चों के फोन में उलझे रहने से न तो वे शारिरिक क्रियाओं में भाग लेते हैं और न ही कोई नई चीज सीखने में उनकी रुची होती है।

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बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के उपाय:

तयशुदा स्क्रीन टाइमः हर दिन मोबाइल इस्तेमाल का नीयत समय तय किया जाना चाहिए।

रचनात्मक गतिविधियांः बच्चों में पेंटिंग, म्यूज़िक, डांस जैसी रचनात्मक गतिविधियों का शौक विकसित करने से बच्चे स्वयं ही फोन से दूरियां बना सकते हैं।

खेलकूद में बढ़ावः आउटडोर गेम्स में भाग लेने के लिए प्रेरित करने पर बच्चों का शारिरक विकास भी तेजी से होने लगेगा।

पैरेंटल कंट्रोल का उपयोग करेंः गूगल फैमिली जैसे ऐप्स के जरिए बच्चों के मोबाइल की निगरानी रखें।
खुद भी उदाहरण बनेंः यदि माता-पिता खुद ही मोबाइल का उपयोग कम करें तो बच्चों में मोबाइल के उपयोग की आदत कम देखने को मिलती है।

सोने से पहले मोबाइल से दूरीः सोने से एक घंटा पहले तक स्क्रीन से दूरियां बनाए रखने से बच्चों को नींद आने में समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।

पेशेवर मदद: गंभीर लत की स्थिति में बाल रोग विशेषज्ञ या मनोवैज्ञानिक से सलाह लेना ही श्रेयस्कर होगा।

मोबाइल फोन का बढ़ता चलन एक वैश्विक समस्या है जो धीरे-धीरे आगामी पीढ़ी पर प्रभाव डाल रहा। इस समस्या का निराकरण करना देश और समाज के विकास के लिए अत्यंत जरूरी हो चुका है।

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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