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Crude Oil Prices : ईरान-अमेरिका युद्ध की तपिश: $100 के पार कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बना बड़ा खतरा

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल का सीधा असर भारत की विकास दर और आम आदमी की जेब पर पड़ना तय माना जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो यदि कच्चे तेल की औसत कीमत एक साल तक $100 प्रति बैरल के आसपास बनी रहती है, तो भारत की जीडीपी (GDP) विकास दर जो वर्तमान में 7.6% अनुमानित है, वह गिरकर 6.6% तक आ सकती है।

भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 90% हिस्सा आयात करता है, जिसमें से आधा हिस्सा अकेले मध्य पूर्व से आता है। युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बाधित होने से न केवल ईंधन महंगा होगा, बल्कि माल ढुलाई की लागत बढ़ने से खाने-पीने की वस्तुओं और रोजमर्रा के सामान की कीमतों में भी भारी उछाल आएगा। इससे देश की महंगाई दर (Inflation) जो फिलहाल नियंत्रण में है, तेजी से बढ़कर 4% के पार जा सकती है, जिससे मध्यम वर्ग का बजट पूरी तरह बिगड़ जाएगा।

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अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सबसे बड़ा झटका ‘चालू खाता घाटे’ (CAD) के रूप में लगेगा। तेल आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने के कारण रुपया अपने सर्वकालिक निचले स्तर तक गिर सकता है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026/27 के लिए चालू खाता घाटा जीडीपी के 0.7-0.8% से बढ़कर 2.2% तक पहुँच सकता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर विदेशी मुद्रा भंडार बचाने और रुपये को संभालने का अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा।

सरकारी खजाने पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा। सरकार ने अगले वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 4.3% रखा है, लेकिन तेल की कीमतें बढ़ने से उर्वरक सब्सिडी (Fertiliser Subsidy) में ₹20,000 करोड़ से ज्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार को अपना घाटा नियंत्रित करने के लिए सड़कों, पुलों और रेलवे जैसे बुनियादी ढांचे के विकास (Infrastructure Spending) के बजट में कटौती करनी पड़ सकती है, जिसका सीधा असर देश में रोजगार सृजन पर पड़ेगा।

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चिंता की बात यह भी है कि भारत के पास वर्तमान में केवल 20 से 25 दिनों का ही ‘स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ (तेल भंडार) मौजूद है। यदि ईरान अपनी धमकी के मुताबिक संघर्ष को खींचता है और तेल की कीमतें $200 प्रति बैरल तक पहुँचती हैं, तो यह भारत के लिए एक गंभीर ऊर्जा संकट पैदा कर सकता है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें ओपेक (OPEC) देशों के रुख और युद्ध की स्थिति पर टिकी हैं।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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