बस्तर में खौफ का दौर खत्म: 116 नेताओं की सुरक्षा में कटौती, 9 दिग्गजों का Z+ घेरा हुआ Z; जानिए Z+ और Z सिक्योरिटी का अंतर

जगदलपुर (बस्तर)। बस्तर संभाग में नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों में मिली बड़ी सफलताओं और सुधरते जमीनी हालात के बीच राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक प्रशासनिक फैसला लिया है। बस्तर में दशकों से कायम खौफ के साये के कमजोर पड़ने के साथ ही प्रदेश के 116 नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा श्रेणी में कटौती कर दी गई है। राज्य गृह विभाग द्वारा पिछले छह महीनों के दौरान किए गए गहन खतरे के आकलन (Threat Assessment) के बाद यह कदम उठाया गया है।
इस नए फैसले के तहत बीजेपी और कांग्रेस के 9 प्रमुख दिग्गजों की उच्चतम Z+ (जेड प्लस) सुरक्षा घटाकर Z (जेड) श्रेणी कर दी गई है। सुरक्षा में बदलाव का यह फैसला वन मंत्री केदार कश्यप, पूर्व मंत्री महेश गागड़ा, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज और पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा समेत बस्तर के कई मौजूदा विधायकों, पूर्व मंत्रियों व सांसदों पर लागू हुआ है।
Z+ और Z सिक्योरिटी में क्या होता है अंतर?
सुरक्षा का नया गणित बस्तर में पुलिस संसाधनों के पुनर्गठन को दर्शाता है:
Z+ (जेड प्लस) सुरक्षा: इस श्रेणी में वीआईपी की चौबीसों घंटे सुरक्षा के लिए लगभग 55 सुरक्षाकर्मियों का कड़ा पहरा होता है, जिसमें एनएसजी कमांडो, एस्कॉर्ट, पायलट वाहन और पीएसओ (पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर) शामिल होते हैं।
Z (जेड) श्रेणी सुरक्षा: इस श्रेणी में कुल सुरक्षाकर्मियों की संख्या घटकर लगभग 22 रह जाती है।
बदलाव का असर: Z+ से Z श्रेणी में आने पर एक नेता की सुरक्षा में तैनात लगभग 33 जवानों की कटौती होती है। बस्तर में 250 से अधिक संरक्षित नेताओं की सुरक्षा में 1,000 से अधिक जवान तैनात थे, जिनमें से अतिरिक्त जवानों को अब आम जनता की सुरक्षा और पुलिसिंग कार्यों में तैनात किया जाएगा।
झीरम घाटी और राजनीतिक हत्याओं की काली छाया से बाहर आता बस्तर
बस्तर की राजनीति में सुरक्षा का मुद्दा हमेशा बेहद संवेदनशील रहा है। 25 मई 2013 को हुए भीषण झीरम घाटी नक्सली हमले में ‘बस्तर टाइगर’ महेंद्र कर्मा, तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, दिनेश पटेल और वरिष्ठ नेता उदय मुदलियार समेत कई दिग्गज नेताओं की बर्बर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद कर्मा परिवार को Z+ सुरक्षा दी गई थी। वहीं, 9 अप्रैल 2019 को दंतेवाड़ा के तत्कालीन भाजपा विधायक भीमा मंडावी की आईईडी ब्लास्ट में हत्या कर दी गई थी। चार दशकों में 100 से अधिक स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों और 118 से अधिक नेताओं ने नक्सली हिंसा में अपनी जान गंवाई है।
इन तमाम काले अध्यायों के बाद, अब सुरक्षा घेरा छोटा होना बस्तर में सामान्य होते हालातों और मजबूत होती शांति प्रक्रिया का एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि यदि भविष्य में सुरक्षा समीक्षा के दौरान किसी जनप्रतिनिधि पर खतरा बढ़ता है, तो सुरक्षा का दायरा पुनः बढ़ाया जा सकता है।



