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झीरम नरसंहार पर एनआईए कोर्ट का फैसला आधा-अधूरा न्याय : कांग्रेस,  राजनीतिक साजिश का पर्दाफाश नहीं हुआ

जांजगीर-चांपा। 25 मई 2013 को हुए झीरम घाटी नरसंहार मामले में आए एनआईए कोर्ट के फैसले को कांग्रेस ने आधा-अधूरा न्याय बताया है।
रविवार को जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा सर्किट हाउस में आयोजित पत्रकार वार्ता में विधायक ब्यास कश्यप, जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने इस मामले में पत्रकारों के समक्ष बात रखते हुए कहा कि हम अदालत के फैसले का आदर करते हैं। अदालत ने वही फैसला दिया जो तथ्य एनआईए ने उसके सामने रखे थे, लेकिन एनआईए की जांच शुरू से ही दिशाहीन रही है। एनआईए ने घटना के राजनीतिक षड्यंत्र वाले पहलू की जांच ही नहीं की। कांग्रेस ने कहा कि एनआईए ने जिन 10 लोगों को गिरफ्तार किया और जिन्हें दोषी पाया गया, वे छोटे नक्सली कैडर हैं। इतनी बड़ी घटना बिना बड़े नक्सली नेताओं के संभव नहीं हो सकती। एनआईए ने शुरुआती एफआईआर में बड़े नक्सली नेताओं के नाम शामिल किए थे, बाद में उन्हें हटा दिया गया।
 
पत्रकार वार्ता में कांग्रेस ने कई बड़े सवाल उठाए –
1.  इस फैसले से घटना के असली साजिशकर्ताओं का पर्दाफाश नहीं हुआ है। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा क्यों हटाई गई थी? यात्रा के मार्ग को किसने और क्यों बदलवाया था?
2.  एनआईए ने जिन 26 लोगों को नामजद कर फरार घोषित किया था, उनमें बसवराज, गणेश उइके, रूपेश उर्फ संजीव, सुरेन्द्र उर्फ रामचंद्र रेड्डी, जयदेव उर्फ बड्डा देव, सोनू उर्फ भूपति जैसे बड़े नाम थे। इनमें से अनेकों ने आत्मसमर्पण भी किया है। एनआईए ने उनसे पूछताछ कब की? क्या एनआईए ने उन्हें निर्दोष मान लिया है?
सरेंडर नक्सलियों से पूछताछ क्यों नहीं हुई? – 
कांग्रेस ने कहा कि झीरम घाटी हत्याकांड में शामिल और एनआईए व पुलिस द्वारा फरार घोषित कई प्रमुख नक्सलियों ने बाद में आत्मसमर्पण किया है, लेकिन उनसे झीरम मामले में पूछताछ नहीं हुई।
– चैतू उर्फ श्याम दादा – दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) का वरिष्ठ सदस्य और झीरम हमले का मुख्य साजिशकर्ता/मास्टरमाइंड, जिस पर 25 लाख का इनाम था। इसने अपने 9 अन्य कैडरों के साथ बस्तर पुलिस के समक्ष सरेंडर किया। रूपेश उर्फ मोल्ला राजिरेड्डी – माओवादी केंद्रीय समिति सदस्य, जिसने सरेंडर के बाद सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि झीरम घाटी नरसंहार संगठन की एक बड़ी गलती थी।
– निर्मला उर्फ सुमित्रा –20 लाख की इनामी महिला कैडर, जो हमले के दौरान अग्रिम मोर्चे और लॉजिस्टिक सपोर्ट में सक्रिय थी। सवाल है कि जब-जब सरकार ने दावा किया कि सरेंडर करने वाले बड़े नक्सली झीरम में शामिल थे, तो एनआईए ने उनसे पूछताछ क्यों नहीं की?
जांच पर गंभीर आरोप – 
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि घटना के कई प्रत्यक्षदर्शी जो घायल भी हुए थे, उनसे एनआईए ने पूछताछ तक नहीं की। जीवित बचे पीड़ितों के बयान नहीं लिए गए, जबकि कई बार प्रभावितों ने शपथ पत्र के साथ एजेंसियों के सामने पेश होने की कोशिश की। घटना के हफ्तों बाद भी शहीदों और घायलों के पर्स, फाइलें और महत्वपूर्ण दस्तावेज घटनास्थल पर बिखरे पड़े रहे और किसी का मोबाइल तक जब्त नहीं किया गया।
एनआईए ने छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा गठित एसआईटी को जांच से क्यों रोका? और एनआईए ने तत्कालीन मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी, एडीजी नक्सल से कब पूछताछ की?
बड़े नक्सली नेताओं के नाम चार्जशीट से क्यों हटे?- 
कांग्रेस ने बताया कि शुरुआत में एनआईए की एफआईआर में दो प्रमुख नक्सली नेता मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति और रमन्ना का नाम था। 21 मार्च 2014 को गणपति और रमन्ना सहित 26 फरार आरोपियों के खिलाफ वारंट भी जारी हुआ था। अगस्त 2014 तक उनका नाम था, लेकिन सितंबर 2014 में पेश प्रारंभिक और अंतिम चार्जशीट से उनका नाम हटा दिया गया। यह क्यों हुआ?
इसी तरह देवा उर्फ सुक्का एलियास देवा का नाम भी शुरुआती जांच में शामिल था और उसे वांछित घोषित कर इनाम भी रखा गया था, फिर उससे पूछताछ क्यों नहीं हुई? कांग्रेस ने मांग की है कि झीरम नरसंहार की राजनीतिक साजिश और सुरक्षा में चूक की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, तभी शहीदों को सच्चा न्याय मिल सकेगा।
पत्रकार वार्ता के दौरान प्रदेश के सह प्रभारी विजय जांगिड़, पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष रमेश पैगवार, प्रदेश सचिव गण गिरधारी यादव, टिंकू मेमन, संदीप अग्रवाल, जिला कांग्रेस सेवादल अध्यक्ष देवकुमार पाण्डेय, जिला पिछड़ा प्रकोष्ठ अध्यक्ष भविष्य चंद्राकर, अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ जिलाध्यक्ष महारथी बघेल, जिला महिला कांग्रेस अध्यक्ष सीमा शर्मा, जिला युंका अध्यक्ष पंकज शुक्ला, जिला कांग्रेस कमेटी उपाध्यक्ष रफीक सिद्दीकी, संगठन महामंत्री शिशिर द्वीवेदी, महामंत्री नागेन्द्र गुप्ता, पूर्व नपा अध्यक्ष भगवान दास गढ़ेवाल सहित अन्य मौजूद थे।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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