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लाल आतंक खत्म! बस्तर के कामाराम गांव में लौटी खुशियां, नक्सलमुक्त होने के बाद गूंजे शहनाई के सुर

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का कामाराम गांव, जो कभी नक्सलियों के खौफ में जी रहा था, अब पूरी तरह बदल चुका है। वर्षों तक जहां सन्नाटा पसरा रहता था, वहां अब खुशियों की गूंज सुनाई देने लगी है। नक्सल प्रभाव खत्म होने के बाद गांव में पहली बार बारात पहुंचने से माहौल उत्सवमय हो गया।

सालों बाद गांव में गूंजी शहनाई
यह गांव लंबे समय तक ऐसा रहा, जहां न तो शादी-ब्याह होते थे और न ही कोई सामाजिक आयोजन। हालात इतने खराब थे कि किसी भी रिश्ते के लिए नक्सलियों की अनुमति लेना जरूरी होता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। दंतेवाड़ा के गोंगपाल गांव से आई बारात ने पूरे गांव को एकजुट कर दिया और लोग इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने।

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पहले नक्सलियों से लेनी पड़ती थी अनुमति
नक्सल प्रभाव के दौर में गांव के लोगों को शादी जैसे निजी फैसलों के लिए भी नक्सलियों की मंजूरी लेनी पड़ती थी।
बारात में कितने लोग आएंगे, कार्यक्रम कब तक चलेगा—हर छोटी-बड़ी जानकारी देना अनिवार्य था। बिना अनुमति के कोई भी आयोजन संभव नहीं था।

दहशत में थम गया था सामाजिक जीवन
नक्सलियों के डर का असर केवल शादी तक सीमित नहीं था। गांव में बच्चे तक खुलकर नहीं खेल पाते थे और लोग बीमार होने या किसी की मृत्यु पर भी बाहर जाने से डरते थे। धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाज भी अधूरे रह जाते थे, जिससे गांव की सांस्कृतिक पहचान लगभग खत्म हो गई थी।

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अब लौट रही है रौनक और परंपरा
अब जब क्षेत्र नक्सलमुक्त हो चुका है, तो गांव में फिर से रिश्ते जुड़ने लगे हैं। लोग अपने घरों की ओर लौट रहे हैं और सामाजिक जीवन फिर से पटरी पर आ रहा है। कामाराम गांव में आई यह बारात केवल एक शादी नहीं, बल्कि नई उम्मीद और आजादी का प्रतीक बन गई है।

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नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ता बस्तर
यह बदलाव दिखाता है कि शांति और सुरक्षा मिलने के बाद समाज कैसे तेजी से आगे बढ़ सकता है। बस्तर के इस गांव में लौटती खुशियां अब पूरे क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत हैं।

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Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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