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कामयाबी के सूत्र महात्मा बुद्ध के जीवन से…

सीनियर आईपीएस डॉक्टर रतन लाल डांगी ने लिखा भगवान बुद्ध पर कुछ महत्वपूर्ण शब्द

रायपुर/बिलासपुर। आज के युवाओं को जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं उनको भगवान बुद्ध के संघर्ष के बारे में जानना चाहिए। उनका सिद्धार्थ से बुद्ध बनना इतना आसान नहीं रहा होगा। इसके लिए उन्होंने कितना संघर्ष किया होगा। वो भी एक ही दिन में बुद्ध नहीं बन गए थे। उनका संघर्ष तो आपके संघर्ष से कई गुना ज्यादा रहा है। आप लोग सुख सुविधा, नौकरी और सफलता पाने के लिए प्रयास करते हैं जबकि सिद्धार्थ वो कि एक राजकुमार थे उनके पास घर, परिवार, महल वो सब कुछ था फिर भी उन्होंने मानव जाति के कल्याण के लिए वे सब त्याग दिए थे।

जिस ज्ञान की प्राधि के लिए उन्होंने सब कुछ छोड़ा उसको पाने में सिद्धार्थ को भी छह साल का समय लग गया था। अलग- अलग जगह कई गुरुओं के पास गए। जंगल में भटके, भूखे-प्यासे रहे कई मुश्किलों का सामना किया पिन भी अपना हौसला नहीं खोया और अंत में एक दिन उस ज्ञान की प्राप्ति कर ली थी।

लेकिन हम देखते हैं कि आज के हमारे युवा जो विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं या कोई स्टार्ट अप शुरू कर रहे हैं उन्हें यह बाद रखना चाहिए कि पहली बार में कुछ ही लोग सफल होते हैं जबकि ज्यादातर लोगों को सफलता काफी संघर्ष के बाद मिलती है तो कई लोगों को तो वो भी नहीं मिलती है। इससे वो निराश, हताश एवं उदास हो जाते हैं एवं तैयारी करना छोड़ देते हैं, जल्दी ही हथियार डाल देते हैं और मैदान छोड़ देते हैं। वो खुद को सांत्वना देने के लिए कहते रहते हैं कि उनको बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। साथ ही अपनी असफलता के लिए कई कारणों जिसमें भौतिक सुविधाओं की कमी, पारिवारिक जिम्मेदारिया, गाइडेंस की कमी इत्यादि को जिम्मेदार बताकर अपने आपको आत्म-संतुष्ट कर लेते हैं। अपनी असफलता की जिम्मेदारी स्वयं नहीं लेते हैं। और अपने लक्ष्य को हासिल करने का विचार ही त्याग देते हैं।

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मेरा मानना है की ऐसे युवाओं को एक बार भगवान बुद्ध के जीवन के संघर्ष के बारे में जरूर पढ़ना चाहिए एवं इस बात पर विचार करना चाहिए की क्या आपका संघर्ष सिद्धार्थ (महात्मा बुद्ध) के संघर्ष से भी बड़ा है?

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राजकुमार (सिद्धार्थ) जिसके पास जीवन जीने की हर सुविधा उपलब्ध थी। नौकर-चाकर थे, इच्छा प्रकट करते ही हर सुविधा उपलब्ध हो जाती थी। सुंदर जीवन साधी था, प्यारा सा बेटा था, सब भौतिक सुविधाएं एवं संसाधन उपलब्ध था। हर ऋतु के हिसाब से सुंक महल था। पिता भी एक राजा थे जिसकी वो इकलौती संतान थे तथा यह भी निश्चित था कि भविष्य में उसे ही राजगद्दी मिलनी थी। उस राजकुमार के पास विलासिता के सब साधन उपलब्ध थे, वैसी भौतिक सुविधाएं पाने का सपना हर व्यक्ति का होता है। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी उन्होंने अपने लक्ष्य (मानव जाति के दुखों के निवारण का मार्ग) को पाने हेतु सब सुविधाओं को त्याग दिए थे एवं जंगल की तरफ प्रस्थान कर गए थे। यह सच उन्होंने अपनी मर्जी से किया था न तो अपने माता-पिता की आज्ञा से किया, न ही किसी दुश्मन के संभावित हमले से अपने आपको बचाने के लिए और न ही अन्य किसी प्रकार के दबाव में किया। इसमें उनका कोई व्यक्तिगतहित भी नहीं दिखाई देता है बल्कि उन्होंने समस्त मानव जाति की पीड़ाओं को दूर करने हेतु कोई मार्ग ढूँढने के लिए किया था। जब उन्होंने टम्री लोगों को देखा तो वे अंदर से दुखी हो गए उनकी करुणा जाग रही थी।

यह कहानी सुनने एवं पढ़ने में जरूर अच्छी लगती है कि वो रात्रि में महल को त्याग कर चले गए। लेकिन कल्पना करने मात्र से ही हम अंदर से सिहर उठते हैं कि पर, पत्नी, बेटा, परिवार, रिश्तेदारों एवं समस्त सुख सुविधाओं को छोड़ते हुए उनके मन में क्या क्या गुजरी होगी। यहाँ से जाने के बाद कहाँ जाना है, कितना जंगल होगा, जंगली जानवरों शेर, चीता, भालू, भेड़िया, जंगली कुत्ते, सांप, बिच्छू के खतरे के बारे में सोचकर ही सामान्य व्यक्ति तो अपना इरादा ही चदल देगा।

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जिसके पास सर्दी, बारिश, गर्मी के अनुसार महल बा उसमें से निकलने के बाद इन ऋतुओं में कैसे रहे होंगे? तपती रेत में पांचों में छाले हो गए होंगे। कड़ाके की सर्दी में ठिठुर गए होंगे। बारिश में कैसे नदी वालों को पार करते होंगे। महल में स्वादिष्ट भोजन करने वाले को भिक्षाटन करना पड़ता होगा। कितने घर मालिकों ने उनको भला बुरा कहा होगा, अपमान किया होगा। और यह सब उन्होंने एक-दो दिन के लिए नहीं सहा था बल्कि पूरे छह साल तक, जब तक उनको ज्ञान नहीं मिल गया था।

ऐसा भी नहीं है कि उसके बाद भी उनकी मुश्किलें कम हो गई हों। हम पढ़ते हैं, सुनते हैं कि उनका जीवन हमेशा चुनौतियों से ही भरा हुआ रहा था। दूसरी विचारधारा के लोग उनका अपमान करने का कोई भी मौका नहीं चूकते थे। सामान्य लोग भी उनका अपमान करते ही रहते थे। उनके अपने सौतेले भाई देवदत्त ने भी उनके अपमान का कोई मौका नहीं छोड़ा था । यहाँ तक उनकी हत्या करने के लिए भी षड्यन्त्र करता रहता था मगध के राजा अजातशत्रु को भी उनके खिलाफ भड़काकर उनकी हत्या करवाना चाहता था।

इतनी चुनौतियों का सामना करते हुए भी बुद्ध अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए थे। और आज हमारे युवा थोड़ी सी मुश्किले आते ही हिम्मत हार जाते हैं। अपने पास संसाधनों की कमी का रोना शुरू कर देते हैं। कोई अपनी आर्थिक स्थिति का तो कोई अन्य कारणों का हवाला देकर अपने लक्ष्य को छोड़ देने को जायज ठहरा देते हैं। इसलिए उनको अपने लक्ष्य का त्याग करने से पहले भगवान बुद्ध के संघर्षों को जरूर पढ़ना चाहिए और अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या मेरी चुनौतियाँ उस सिद्धार्थ से भी ज्यादा है? निश्चित रूप से नहीं ऐसा ही जबाब आएगा।

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युवाओं को बुद्ध के ये उपदेश हमेशा याद रखना चाहिए कि मेहनत के बिना कुछ हासिल नहीं होता एवं आलस और कामचोरी से जीवन चर्बाद हो जाता है। वहीं सुखी और खुशहाल जीवन जीने का एक मात्र तरीका है मेहनत। इसलिए जीवन में सफल बनने या कुछ हासिल करने के लिए मेहनत जरूरी है। गौतम बुद्ध ने कहा है, ‘मेहनत करो क्योंकि मेहनत के बिना कुछ हासिल नहीं होता है।

जुद्ध कहते हैं कि व्यक्ति को हमेशा अच्छी संगत में रहना चाहिए। कहा जाता है कि जैसी आपकी संगत होगी आप भी वैसे ही बन जाएंगे। इसलिए युवाओं को अच्छी संगत में ही रहना चाहिए जिनके लक्ष्य एक समान हो। नकारात्मक विचारों वाले लोगों से हमेशा दूर ही रहें।
महात्मा बुद्ध के मुताबिक क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है, क्योंकि जिस इंसान का अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं होता, वह कई बार ऐसे फैसले ले लेता है, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान उसको ही होता है, क्रोध में कई बार युवा अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर लेते है इसलिए मनुष्य की अपने क्रोध पर काबू करना चाहिए।

बुद्ध ने कहा है, जैसा हम सोचते हैं ठीक वैसा ही हम बन जाते हैं। इसलिए, जब मन शुद्ध होता है, तब प्रसन्नता परछाई की तरह हमारा पीछा करती है। इसीलिए हमेशा सकारात्मक बनें और सकारात्मक सोचें। चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो आपके खुश रहने और सकारात्मक सोचने से आपके जीवन में खुशियां बनी रहेंगी। व्यक्ति के सोच से जीवन बदल सकता है और बिगड़ भी सकता है। इसलिए हमेशा अपने लक्ष्य के बारे में सकारात्मक सोच रखना चाहिए । बुद्ध से संघर्षशील युवाओं को सफलता के सूत्र सौखना चाहिए। आज के संघर्षशील युवाओं को भी बुद्ध से अपने लक्ष्य को पाने के सूत्र सीखना चाहिए।

डॉ. रतन लाल डांगी, आईपीएस

Mukesh Tiwari

Editor in Chief- Dabang News Today

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