कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए स्वामी राघवाचार्य जी महाराज ने जड़भरत उपाख्यान सुनाते हुए बताया कि मोह और आसक्ति के कारण राजा भरत को अगले जन्म में हिरण बनना पड़ा, इसलिए जीव को सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर परमात्मा के चरणों की अनन्य भक्ति में लीन रहना चाहिए। उन्होंने भूगोल और 21 प्रकार के नरकों का वर्णन करते हुए शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को दिए गए उपदेशों का उल्लेख किया। महाराज श्री ने कहा कि भगवान के चरणों की निष्काम भक्ति से जीव जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।
कथा में नाम-महिमा समझाते हुए पूज्य महाराज श्री ने ‘हो जाओ तैयार गाड़ी स्टेशन पे आती है’ और ‘राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट’ का भाव स्पष्ट करते हुए अजामिल मोक्ष की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि प्रभु का नाम चाहे भाव से लिया जाए या अनजाने में, वह मनुष्य का उद्धार ही करता है। इसके बाद भक्त प्रह्लाद की कथा सुनाते हुए बताया कि अपने भक्त की वाणी और विश्वास की रक्षा के लिए भगवान नृसिंह खंभे को चीरकर प्रकट हुए। इसके साथ ही समुद्र मंथन, वामन अवतार और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कथा का सुंदर चित्रण किया गया।
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर झूमे श्रद्धालु
कथा के चौथे दिन जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन प्रसंग आया, पूरा पंडाल बधाई गीतों और जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर और भजनों की धुन पर थिरकते हुए कान्हा के बाल रूप की अगवानी की। जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में माखन-मिश्री और खिलौनों का प्रसाद वितरित किया गया। बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने महाआरती में शामिल होकर पुण्य लाभ अर्जित किया।